Wednesday, 26 July 2017

किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए कदम

           सॉयल हेल्थ कार्ड (एसएचसी) योजना जिससे किसान अपनी मिट्टी में उपलब्ध बड़े और छोटे पोषक तत्वों का पता लगा सकते हैं।


          इससे उर्वरकों का उचित प्रयोग करने और मिट्टी की उर्वरता सुधारने में मदद मिलेगी। नीम कोटिंग वाले यूरिया को बढ़ावा दिया गया है ताकि यूरिया के इस्तेमाल को नियंत्रित किया जा सके, फसल के लिए इसकी उपलब्धता बढ़ाई जा सके और उर्वरक की लागत कम की जा सके। घरेलू तौर पर निर्मित और आयातित यूरिया की संपूर्ण मात्रा अब नीम कोटिंग वाली है।
           कृषि और किसान कल्याण राज्य मंत्री पुरूषोत्तम रूपाला ने लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में यह जानकारी दी। परंपरागत कृषि विकास योजना (पीकेवीवाई) को लागू किया जा रहा है ताकि देश में जैव कृषि को बढ़ावा मिल सके। इससे मिट्टी की सेहत और जैव पदार्थ तत्वों को सुधारने तथा किसानों की आमदनी बढ़ाने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई (पीएमकेएसवाई) योजना को लागू किया जा रहा है ताकि सिंचाई वाले क्षेत्र को बढ़ाया जा सके, जिसमें किसी भी सूरत में सिंचाई की व्यवस्था हो, पानी की बर्बादी कम हो, पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जा सके।
         राष्ट्रीय कृषि विपणन योजना (ई-एनएएम) की शुरूआत 14.04.2016 को की गई थी। इस योजना से राष्ट्रीय स्तर पर ई-विपणन मंच की शुरूआत हो सकेगी और ऐसा बुनियादी ढांचा तैयार होगा जिससे देश के 585 नियमित बाजारों में मार्च 2018 तक ई-विपणन की सुविधा हो सकेगी। अब तक 13 राज्यों के 455 बाजारों को ई-एनएएम से जोड़ा गया है। यह नवाचार विपणन प्रक्रिया बेहतर मूल्य दिलाने, पारदर्शिता लाने और प्रतिस्पर्धा कायम करने में मदद करेगी, जिससे किसानों को अपने उत्पादो के लिए बेहतर पारिश्रमिक मिल सकेगा और ‘एक राष्ट्र एक बाजार’ की दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा। 
        प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को खरीफ मौसम 2016 से लागू किया गया और यह कम प्रीमियम पर किसानों के लिए उपलब्ध है। इस योजना से कुछ मामलो में कटाई के बाद के जोखिमों सहित फसल चक्र के सभी चरणों के लिए बीमा सुरक्षा प्रदान की जाएगी। सरकार 3 लाख रुपये तक के अल्प अवधि फसल ऋण पर 3 प्रतिशत दर से ब्याज रियायत प्रदान करती है। 
         वर्तमान में किसानों को 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष की ब्याज दर से ऋण उपलब्ध है जिसे तुरन्त भुगतान करने पर 4 प्रतिशत तक कम कर दिया जाता है। ब्याज रियायत योजना 2016-17 के अंतर्गत, प्राकृतिक आपदाओं की स्थिति में किसानों को राहत प्रदान करने के लिए 2 प्रतिशत की ब्याज रियायत पहले वर्ष के लिए बैंकों में उपलब्ध रहेगी। किसानों द्वारा मजबूरी में अपने उत्पाद बेचने को हतोत्साहित करने और उन्हें अपने उत्पाद भंडार गृहों की रसीद के साथ भंडार गृहों में रखने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए ऐसे छोटे और मझौले किसानों को ब्याज रियायत का लाभ मिलेगा, जिनके पास फसल कटाई के बाद के 6 महीनों के लिए किसान क्रेडिट कार्ड होंगे। 
          राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) को सरकार उनकी जरूरतों के मुताबिक राज्यों में लागू कर सकेगी, जिसके लिए राज्य में उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। राज्यों को उऩकी जरूरतों, प्राथमिकताओं और कृषि-जलवायु जरूरतों के अनुसार योजना के अंतर्गत परियोजनाओँ/कार्यक्रमों के चयन, योजना की मंजूरी और उऩ्हें अमल में लाने के लिए लचीलापन और स्वयत्ता प्रदान की गई है। 
          राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (एनएफएसएम), केन्द्र प्रायोजित योजना के अंतर्गत 29 राज्यों के 638 जिलों में एनएफएसएम दाल, 25 राज्यों के 194 जिलों में एनएफएसएम चावल, 11 राज्यों के 126 जिलों में एनएफएसएम गेहूं और देश के 28 राज्यों के 265 जिलों में एनएफएसएम मोटा अनाज लागू की गई है ताकि चावल, गेहूं, दालों, मोटे अऩाजों के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाया जा सके। 
       एनएफएसएम के अंतर्गत किसानों को बीजों के वितरण (एचवाईवी/हाईब्रिड), बीजों के उत्पादन (केवल दालों के), आईएनएम और आईपीएम तकनीकों, संसाधन संरक्षण प्रौद्योगिकीयों/उपकणों, प्रभावी जल प्रयोग साधन, फसल प्रणाली जो किसानों को प्रशिक्षण देने पर आधारित है, को लागू किया जा रहा है। राष्ट्रीय तिलहन और तेल (एनएमओओपी) मिशन कार्यक्रम 2014-15 से लागू है। इसका उद्देश्य खाद्य तेलों की घरेलू जरूरत को पूरा करने के लिए तिलहनों का उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाना है। 
         इस मिशन की विभिन्न कार्यक्रमों को राज्य कृषि/बागवानी विभाग के जरिये लागू किया जा रहा है। बागवानी के समन्वित विकास के लिए मिशन (एमआईडीएच), केन्द्र प्रायोजित योजना फलों, सब्जियों के जड़ और कन्द फसलों, मशरूम, मसालों, फूलों, सुगंध वाले वनस्पति,नारियल, काजू, कोको और बांस सहित बागवानी क्षेत्र के समग्र विकास के लिए 2014-15 से लागू है। 
          इस मिशन में ऱाष्ट्रीय बागवानी मिशन, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए बागवानी मिशन, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड, नारियल विकास बोर्ड और बागवानी के लिए केन्द्रीय संस्थान, नागालैंड को शामिल कर दिया गया है। सरकार ने कृषि उत्पाद और पशुधन विपणन (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2017 को तैयार किया जिसे राज्यों के संबद्ध अधिनियमों के जरिये उनके द्वारा अपनाने के लिए 24.04.2017 को जारी कर दिया गया। यह अधिनियम निजी बाजारों, प्रत्यक्ष विपणन, किसान उपभोक्ता बाजारों, विशेष वस्तु बाजारों सहित वर्तमान एपीएमसी नियमित बाजार के अलावा वैकल्पिक बाजारों का विकल्प प्रदान करता है ताकि उत्पादक और खरीददार के बीच बिचौलियों की संख्या कम की जा सके और उपभोक्ता के रुपए में किसान का हिस्सा बढ़ सके।
           सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य के अंतर्गत गेहूं और धान की खरीद करती है। सरकार ने राज्यों-संघ शासित प्रदेशों के अनुरोध पर कृषि और बागवानी से जुड़ी उन वस्तुओं की खरीद के लिए बाजार हस्ताक्षेप योजना लागू की है जो ऩ्यनतम समर्थन मूल्य योजना के अंतर्गत शामिल नहीं है। बाजार हस्ताक्षेप योजना इन फसलों की पैदावार करने वालों को संरक्षण प्रदान करने के लिए लागू की गई है ताकि वह अच्छी फसल होने पर मजबूरी में कम दाम पर अपनी फसलों को न बेचें।
         न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीफ और रबी दोनों तरह की फसलों के लिए अधिसूचित होता है जो कृषि आयोग की लागत और मूल्यों के बारे में सिफारिशों पर आधारित होता है। आयोग फसलों की लागत के बारे में आंकडे एकत्र करके उनकी विश्लेषण करता है और न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करता है। देश में दालों और तिलहनों की फसलों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर खरीफ 2017-18 के लिए बोनस की घोषणा की है। 
         सरकार ने पिछले वर्ष भी दालों और तिलहनों के मामले में न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर बोनस देने की पेशकश की थी। सरकार के नेतृत्व में बाजार संबंधी अन्य हस्तक्षेप जैसे मूल्य स्थिरीकरण कोष और भारतीय खाद्य निगम का संचालन भी किसानों की आमदनी बढ़ाने का अतिरिक्त प्रयास है।  अलावा सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए मधु मक्खियां रखने जैसे क्रियाकलापों पर ध्यान दे रही है।

Thursday, 20 July 2017

गुणवत्‍ता चिह्न तीन वर्षों की अवधि के लिए मान्‍य

          केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कृषि भवन, नयी दिल्ली में नेशनल डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड (एनडीडीबी) के गुणवत्ता चिह्न लोगो को लांच किया। 

   इस मौके पर केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री सुदर्शन भगत, देवेंद्र चौधरी, सचिव डीएएचडीएंडएफ, दिलीप रथ, अध्य्क्ष राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड भी उपस्थित थे। कृषि मंत्री ने इस मौके पर चयनित 14 निर्माण इकाइयों को दूध एवं दूध उत्पादों के लिए खादय सुरक्षा तथा गुणवत्ता प्रबंधन प्रणालियों को अपनाने तथा गुणवत्ता चिन्ह मापदंडों का पालन करने पर लोगों को प्रमाण पत्र भी दिया। 
          कृषि मंत्री ने कहा कि एनडीडीबी गुणवत्‍ता चिह्न लोगो का एक समूह ब्रांड पहचान के रूप में शुभारंभ कर रहा है। यह लोगो डेरी सहकारिताओं तथा उत्‍पादक संस्‍थाओं से सुरक्षित एवं गुणवत्‍ता दूध एवं दूध उत्‍पादों का द्योतक है। यह उपभोक्‍ताओं की इस मान्‍यता को मजबूती प्रदान करता है कि गुणवत्‍ता चिह्न अच्‍छी गुणवत्‍ता का पर्याय है।
          सिंह ने इस मौके पर कहा कि एनडीडीबी के गुणवत्‍ता चिह्न से डेरी सहकारिताओं तथा उत्‍पादक संस्‍थाओं को अति आवश्‍यक ब्रांड पहचान तथा प्रतिस्‍पर्धात्‍मक बढ़त मिलेगी। इससे डेरी सहकारी ब्रांडों पर उपभोक्‍ता के विश्‍वास को मजबूती मिलेगी ।
         कृषि मंत्री ने कहा कि इसका उद्देश्‍य उत्‍पादक से उपभोक्‍ता तक संपूर्ण वेल्‍यू चेन में प्रक्रियात्‍मक सुधार लाना है ताकि गुणवत्‍ता दूध व दूध उत्‍पादों की उपलब्‍धता सुनिश्चित की जा सके। यह पहल खाद्य सुरक्षा तथा गुणवत्‍ता प्रबंधन के लिए कोई नई-अतिरिक्‍त प्रणाली प्रस्‍तावित नहीं करती, बल्कि गुणवत्‍ता तथा सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए आवश्‍यक प्रक्रियाओं को निर्धारित करती है। 
         कृषि मंत्री ने इस मौके पर बताया कि ग्‍यारह सदस्‍यीय प्रबंध समिति इस गुणवत्‍ता चिह्न की गतिविधियों की देखरेख करेगी। इसके सदस्‍यों में डीएडीएफ के प्रतिनिधि तथा विभिन्‍न क्षेत्रों का प्रतिनिधित्‍व करने के लिए चार महासंघों के प्रबंध निदेशक शामिल हैं। इस प्रबंध समिति में एफएसएसएआई के प्रतिनिधि तथा डेरी उद्योग के दो विशेषज्ञ भी शामिल हैं। 
        उन्होंने कहा कि इच्‍छुक महासंघ, सहकारी डेरियां, शैक्षिक संस्‍थान, सरकारी डेरी इकाइयॉं गुणवत्‍ता चिह्न के लिए आवेदन कर सकती हैं। इसमें केवल वे ही डेरी इकाइयां पात्र हैं जो दूध एवं दूध उत्‍पादों के लिए खाद्य सुरक्षा एवं गुणवत्‍ता प्रबंधन प्रणालियों को अपनाती हैं तथा गुणवत्‍ता चिह्न में दिशा-निर्देशों में निर्धारित मापदंडों का पालन करती हैं। 
      सिंह ने इस मौके पर कहा कि गुणवत्‍ता चिह्न तीन वर्षों की अवधि के लिए मान्‍य होगा बशर्ते कि गुणवत्‍ता तथा खाद्य सुरक्षा मानकों का निर्वहन तथा अनुबंध के नियम एवं शर्तों का पालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हालांकि गुणवत्‍ता चिह्न प्रदान करने का अनुमोदन तीन वषों के लिए वैध है, परन्‍तु गुणवत्‍ता चिह्न के मापदंडों के अनुपालन की जांच के लिए वर्ष में एक बार निगरानी लेखा परीक्षा की जाएगी।
       उन्होंने जानकारी दी कि जनवरी 2016 में शुरू हुई इस पहल के समयसे एनडीडीबी को देशभर की सहकारिताओं से 55 आवेदन प्राप्‍त हुए हैं। इसमें से 14 इकाइयों ने दो चरण वाली मूल्‍यांकन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है। शेष 31 डेरियों को सुधार के क्षेत्रों के बारे में सूचित किया गया है। उन्‍हें सुधारात्‍मक उपायों के क्रियान्‍वयन के लिए 6-9 महीने उपलब्‍ध कराए गए।
       कृषि मंत्री ने कहा कि एनडीडीबी की इस पहल से एफएसएसएआई के प्रयासों को सहायता तथा मजबूती मिलेगी। इससे देशभर की विभिन्‍न डेरी इकाइयों में दिशा-निर्देश दस्‍तावेज में उल्लिखित गुणवत्‍ता उपायों को अपनाने के लिए अपेक्षित जागरूकता भी पैदा होगी। 
        इस मौक पर सुदर्शन भगत ने कहा प्रतिभागी डेयरी इकाइयों के परिचालन संबंधी मापदंडों की निगरानी एवं प्रमाणन किया जाएगा। मूल्याकंन दो चरण वाली प्रकिया है जिसमें पूर्व मूल्याकन एवं अंतिम मूल्याकन शामिल है। पूर्व-मूल्‍यांकन व्‍यापक तौर पर गांव स्‍तरीय संकलन तथा प्रसंस्‍करण बुनियादी ढ़ांचे की उपलब्‍धता, जनशक्ति प्रशिक्षण तथा खुदरा बिक्री को कवर करता है।
    अंतिम मूल्‍यांकन के लिए केवल उन्‍हीं इकाइयोंपर विचार किया जाता है जो प्राथमिक मूल्‍यांकन में 70ऽ से अधिक अंक प्राप्‍त करती हैं।यह मूल्‍यांकन तीन विशेषज्ञों की टीम द्वारा किया जाता है जिसमें एक बाहरी विशेषज्ञ होता है। अंतिम मूल्‍यांकन महत्‍वपूर्ण तथा प्रमुख मापदंडों के लिए किया जाता है जो प्रसंस्‍कृत दूध एवं दूध उत्‍पादों की गुणवत्‍ता को प्रभावित करते हैं।

Tuesday, 18 July 2017

दालों के लिए 834.71 करोड़ रूपये का आबटन

        वित्‍त वर्ष 2017-18 के लिए राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा अभियान के लिए 1720.00 करोड़ रूपये (भारत सरकार का हिस्‍सा) निर्धारित किए गए हैं।

        इसमें से अब तक देश में दालों का उत्‍पादन बढ़ाने के लिए एनएफएसएम दालों के लिए 834.71 करोड़ रूपये राज्‍यों को आं‍बटित किए जा चुके हैं तथा 169.28 करोड़ रूपये दाल कार्यक्रम लागू करने के लिए राज्‍यों को जारी किए जा चुके हैं।
      दालों की खेती के संदर्भ में किसानों में जागरूकता पैदा करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं। जैसे राज्‍य सरकार और कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्‍यम से नवीनतम फसल उत्‍पादन प्रणाली आधारित सबूत प्रदर्शित करना तथा फसल उत्‍पादन प्रणाली आधारित प्रशिक्षण प्रदान करना आदि। 
       इसके अतिरिक्‍त आईसीएआर संस्‍थाओं-कृषि विज्ञान केन्‍द्रों (केवीके) राज्‍य कृषि विश्‍व विद्यालयों (एसएयू) द्वारा बीज केन्‍द्रों के माध्‍यम से दालों का बीज उत्‍पादन भी किया जा रहा है।यह सूचना लोकसभा में एक प्रश्‍न के लिखित उत्‍तर में कृषि और किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री एस.एस.आहलूवालिया द्वारा प्रदान की गई।

Sunday, 16 July 2017

कृषि क्षेत्र में 1951 की तुलना में खाद्यान्‍न उत्‍पादन 5 गुणा

        केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि कृषि वैज्ञानिकों ने हरित क्रान्ति और उसके पश्‍चात अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी विकास करके भारत में कृषि के विकास में उल्‍लेखनीय भूमिका निभाई है। 

        कृषि मंत्री ने यह बात पूसा में आयोजित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 89वें स्थापना दिवस एवं वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह में कही। कृषि मंत्री ने कहा कि कृषि क्षेत्र में सन् 1951 की तुलना में देश में खाद्यान्‍न के उत्‍पादन में 5 गुणा, मत्‍स्‍य उत्‍पादन में 14.3 गुणा, दुग्‍ध उत्‍पादन में 9.6 गुणा और अण्‍डा उत्‍पादन में 47.5 गुणा वृद्धि हुई है। बागवानी सेक्‍टर में, 1991-92 की तुलना में फल तथा सब्‍जी उत्‍पादन में तीन गुणा वृद्धि हासिल की गई है। 
         इस प्रकार के विकास का राष्‍ट्र की खाद्य एवं पोषणिक सुरक्षा पर सीधा प्रभाव पडा है। वैज्ञानिकों द्वारा उच्‍चतर कृषि शिक्षा में उत्‍कृष्‍टता को आगे बढाने में भी महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई गई है। हमारे वैज्ञानिक विज्ञान व प्रौद्योगिकी विकास के इनोवेटिव क्षेत्रों में संलग्‍न हैं और उन्‍हें अपने विषय क्षेत्रों में अंतर्राष्‍ट़ीय स्‍तर पर सराहा जाता है। 
      पुरस्कार वितरण समारोह में 19 विभिन्‍न श्रेणियों में उत्‍कृष्‍टता के लिए 122 पुरस्‍कार प्रदान किए गये जिसमें 3 संस्‍थान, 12 कृषि विज्ञान केन्‍द्र, 19 किसान, 30 महिलाओं सहित 80 वैज्ञानिक शामिल हैं।
          इस मौके पर कृषि व किसान कल्‍याण तथा संसदीय कार्य राज्‍य मंत्री एस.एस. अहलूवालिया, कृषि व किसान कल्‍याण तथा पंचायती राज राज्‍य मंत्री परशोत्‍तम रूपाला, कृषि व किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री सुदर्शन भगत, डेयर के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. त्रिलोचन महापात्र और कृषि विश्‍वविद्यालयों के कुलपति मौजूद थे।
        कृषि मंत्री ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद वह अग्रणी संगठन है जिसके द्वारा इस देश में हरित क्रान्ति का सूत्रपात किया गया जिससे आज राष्‍ट्र खाद्यान्‍न की कमी वाली स्थिति से निकलकर खाद्यान्‍न में आत्‍मनिर्भर और अब सरप्‍लस खाद्यान्‍न की स्थिति तक आने में सफल रहा है। कृषि एवं सम्‍बद्ध सेक्‍टर की ग्रास वैल्‍यू एडिड (जिसे पहले जीडीपी के नाम से जाना जाता था) में 18 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी है।
          देश में लगभग 274 मिलियन टन खाद्यान्‍न का रिकार्ड उत्‍पादन हुआ है जो कि प्रौद्योगिकियों, गुणवत्‍ता बीजों की उपलब्‍धता और किसानों को सुलभ कराई जा रहीं सम्‍बद्ध सेवाओं के फलस्‍वरूप संभव हो पाया है। इस उपलब्धि में जहां एक ओर आईसीएआर के संस्‍थानों और राज्‍य कृषि विश्‍वविद्यालयों के सकारात्‍मक प्रयास हैं वहीं दूसरी ओर किसानों की कडी मेहनत है। 
          कृषि मंत्री ने कहा कि कृषि क्षेत्र को महत्‍व देते हुए सरकार ने कृषि के टिकाऊ विकास के लिए अनेक कदम उठाये हैं। कृषि में सुधार लाने और किसान कल्‍याण को बढाने के लिए अनेक उपायों का प्रस्‍ताव है जैसे कि वर्ष 2018 तक 2.85 मिलियन हेक्‍टेयर को सिंचित क्षेत्र के अंतर्गत लाना; ग्राम पंचायतों और नगर पालिकाओं को रूपये 2,87,000 करोड (42.1 बिलियन यूएस डॉलर) की सहायता प्रदान करना और सभी गांवों में बिजली पहुंचाना शामिल है। 
      उन्होंने इस मौके पर जानकारी दी कि सरकार द्वारा कृषि उत्‍पादन में सुधार लाने में महत्‍वपूर्ण दो प्रमुख कारकों (मृदा एवं जल) में समाधान हेतु पहले ही कदम उठाये जा चुके हैं। मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड स्‍कीम और जैविक खेती स्‍कीम 'परम्‍परागत कृषि विकास योजना' के माध्‍यम से टिकाऊ आधार पर मृदा की उर्वरता में सुधार लाने के लिए कदम उठाये गये हैं।
            प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना के माध्‍यम से सिंचाई तक पहुंच में सुधार लाना, प्रति बूंद–अधिक फसल द्वारा जल की प्रभावशीलता को बढाना, तथा किसानों की आय को बढाने के लिए एकीकृत राष्‍ट्रीय कृषि बाजार। कृषि विकास के लिए जलवायु प्रतिकूलताओं से किसानों के जोखिम को कवर करने में 'प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना' को एक प्रमुख लैण्‍डमार्क पॉलिसी के रूप में व्‍यापक मान्‍यता मिली है।
         उन्होंने इस बात पर खुशी है जताई कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के संस्‍थानों, कृषि विश्‍वविद्यालयों और विभिन्‍न विकास विभागों द्वारा भारत सरकार की सॉयल हैल्‍थ कार्ड स्‍कीम को अत्‍यंत सफल बनाया गया है। कृषि मंत्री ने उम्मीद जताई कि सरकारी योजनाओं की सफलता के लिए युवा अनुसंधानकर्मी विशेष पहल करेंगे।

विश्व का सबसे बड़ा सहकारी आंदोलन, 40 करोड़ सदस्य

        केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि आज भारतीय सहकारी आंदोलन विश्व के सबसे बड़े सहकारी आंदोलन के रूप में स्थापित है।

     भारत वर्ष में सहकारिता की पहुंच गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक है। कृषि मंत्री ने यह बात अमरेली जिला दुग्ध उत्पादक संघ, मर्यादित द्वारा अमरेली, गुजरात में आयोजित सहकारिता सम्मेलन के उद्घाटन के मौके पर कही। इस मौके पर केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण एवं पंचायती राज राज्यमंत्री, पुरूषोत्तम रूपाला भी मौजूद थे।
         कृषि मंत्री ने कहा कि देश में 7 लाख से अधिक सहकारी समितियां है, जो ग्रामीण स्तर समितियों से लेकर राष्ट्रीय स्तर के सहकारी संगठनों तक फैली हुई है। देश की सहकारी समितियों में कुल सदस्यता 40 करोड़ से भी अधिक है। इसमें लगभग 97 प्रतिशत गांव तथा लगभग 71 प्रतिशत कुल ग्रामीण परिवार शामिल है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि सहकारी साख द्वारा 16.9 प्रतिशत, उर्वरक उत्पादन का 29 प्रतिशत, चीनी उत्पादन का 40 प्रतिशत, बुनकर सहकारिताओं का 54 प्रतिशत आदि का योगदान दिया जा रहा है।
         सिंह ने बताया कि भारतीय सहकारिताओं ने अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में अपने को मजबूती से स्थापित किया है जैसे डेयरी, बैंकिंग, चीनी, उर्वरक, विपणन, हैण्डलूम, मत्स्य, गृह निर्माण। सहकारी समितियों ने ऋण,उर्वरक, बीज जैसे इनपुट मुहैया कराकर किसानों की राह आसान की है। आज डेयरी सहकारिता ने तो देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बनाई है। गुजरात व महाराष्ट्र में डेयरी के साथ-साथ चीनी मिल एवं ऋण समितियों का विकास हुआ तो दक्षिण भारतीय राज्यों में मछली और वन आधारित समितियों का। 
       कृषि मंत्री ने बताया कि राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम ने सहकारिता के समग्र विकास हेतु सहकारी संस्थाओं को सहायता प्रदान करता है जिसमें सरकार से प्राप्त अनुदान एवं ऋण शामिल है। गुजरात में डेयरी, भंडारण एवं शीत भंडारण, सहकारी समितियों के कम्प्यूटरीकरण, चीनी कपड़ा एवं उपभोक्ता सहकारिताओं को वित्तीय सहायता प्रदान की है। इन योजनाओं के तहत वर्ष 2014-2015, 2015-16 एवं 2016-17 के दौरान क्रमशः रु. 663.23 करोड़ स्वीकृत किए गए तथा क्रमशः रु. 133.45 करोड़, रु. 272.97 करोड़ एवं रु. 424.04 करोड़ दिए गए। 
        राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम द्वारा वर्ष 2011-14 में 15143.76 करोड़ राशि निर्गत की गई थी। वहीं मौजूदा केंद्र सरकार के 3 वर्षों में (वर्ष 2014-17) में यह 89.98 प्रतिशत बढ़कर 28771.31 करोड़ निर्गत की गयी।
      उन्होंने सभी समितियों के प्रतिनिधियों से आग्रह किया कि वे समितियों के आर्थिक सुधार एवं क्षेत्रीय असंतुलन को हटाने के लिए एनसीडीसी के विभिन्न विकासात्मक कार्यक्रमों से सहयोग लें। सिंह ने कहा कि सहकारी शिक्षा और प्रशिक्षण कार्यक्रम सहकारिता विकास का अहम अंग है। सहकारी समितियों को सक्षम बनाने के लिए एक सतत प्रक्रिया है। 
          प्रशिक्षण इसलिए जरूरी है कि समितियों को योग्य एवं व्यवसायिक नेतृत्व मिले। कुशल मानव संसाधन जब तक नहीं मिलेगा तब तक सहकारिताओं के विस्तार में कमी आयेगी। इसलिए सहकारी शिक्षण एवं प्रशिक्षण तंत्र को मजबूत बनाना होगा।
         भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ देश में सहकारी आन्दोलन को विकसित करने के लिए कठिन प्रयास कर रहा है तथा सहकारी क्षेत्र के सुदृढ़ीकरण हेतु सदस्य संगठनों को शिक्षित करने, मार्गदर्शन देने और सहायता प्रदान करने में अहम भूमिका निभा रहा है।

Friday, 14 July 2017

खाद्यान्‍न उत्‍पादन 273 मिलियन मीट्रिक टन, सारे रिकार्ड तोड़े

       केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि अपने कौशल में सुधार करके, नवीन कार्य प्रणालियों का प्रयोग करके तथा तत्‍पश्‍चात परिकल्पित कार्यक्रमों के कार्यान्‍वयन में आपसी सहयोग के द्वारा ही 2022 तक किसानों की आय को दुगुना करने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लक्ष्य को हासिल किया जायेगा।

      केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने यह बात आज फैडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्‍ट्री (फिक्की) में किसानों की आय दुगुनी करने के बेहतर कृषि विपणन समाधान विषय पर आयोजित राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में कही।
         इस सम्मेलन में राजस्थान, हरियाणा, असम, गोवा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और बिहार के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। 
      राधा मोहन सिंह ने इस मौके पर कहा कि तृतीय अग्रिम अनुमानों के अनुसार देश में 2016-17 में खाद्यान्‍न का उत्‍पादन बढ़कर 273 मिलियन मीट्रिक टन, तिलहन का उत्‍पादन बढ़कर 32.5 मिलियन मीट्रिक टन, गन्‍ना 306 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है। द्वितीय अग्रिम अनुमान के अनुसार फलों और सब्जियों का उत्‍पादन बढ़कर 287 मिलियन मीट्रिक टन हो गया है।
            उन्होंने बताया कि 2016-17 में खादयान्नों का रिकार्ड उत्पादन हुआ है और खादयान्न उत्पादन के अब तक के सारे रिकार्ड टूट गये हैं। सिंह ने कहा कि किसानों को उनकी उपज के हिसाब से बढ़ा हुआ पारिश्रमिक नहीं मिल रहा है। सरकार मंडी व्‍यवस्‍था को सुदृढ़ करने की जरूरत को लेकर संवेदनशील है और वह इस दिशा में कार्य कर रही है, जिससे कि फसल की कटाई के पश्‍चात होने वाले नुकसान को कम किया जा सके और किसान बम्‍पर उत्‍पादन के दौरान कीमतों में होने वाली अप्रत्‍याशित गिरावट तथा कम उत्‍पादन के कारण मार्केटेबल सरप्‍लस की कम उपलब्‍धता, दोनों ही स्थितियों में स्‍वयं को पार पा सकें।
          केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि इस प्रकार अपनाई गई सोच के अंतर्गत लागत प्रभाव उत्‍पादन को अपनाना, कृषि को उच्‍च मूल्‍य वर्ग की फसलों को उगाने, कृषि वानिकी, पशुधन और मुर्गीपालन, मत्‍स्‍यपालन आदि विविधता की ओर अग्रसर करना तथा सुलभ और अच्छी मंडियां उपलब्‍ध कराना शामिल है, ताकि एक मजबूत वेल्‍यू सप्‍लाई चेन के द्वारा किसानों को उनकी उपज की बेहतर कीमत दिलाई जा सके। 
        उन्होंने कहा कि सरकार किसानों की भावनाओं को समझती हैं और इसी उद्देश्‍य से कृषक कल्‍याण केन्‍द्रित कार्यक्रम और नीतियां बनाई गयी हैं जो कि खाद्य सुरक्षा के साथ-साथ मूल्‍य सुरक्षा के साथ भी समान रूप से जुड़ी हुई हैं।
         सिंह ने बताया कि कृषि उपज मंडी समितियों(ए.पी.एम.सी.) द्वारा प्रोमोट की गई वर्तमान कृषि विपणन प्रणाली की कठिनाईयों से निपटने के लिए और किसानों को सुलभ विपणन सुविधाओं की उपलब्‍धता सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा सक्रियता पूर्वक एक सुधारात्‍मक एजेंडे को राज्‍यों के समक्ष रखा गया और अब मॉडल ए.पी.एम.सी. एक्‍ट, 2003 को राज्‍यों को परिचालित किए जाने के बाद पिछले 2-3 वर्षों में पहले की अपेक्षा इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ने में सक्षम हुए हैं। 
        राधा मोहन सिंह ने जानकारी दी कि मॉडल कृषि उपज और पशुधन विपणन (प्रोत्‍साहन और सुविधा) अधिनियम, 2017 दिनांक 24 अप्रैल, 2017 को राज्‍यों को जारी किया गया था और इसके अंगीकरण के संबंध में सभी राज्‍यों की ओर से सकारात्‍मक प्रतिक्रियाएं प्राप्‍त हुई हैं। उन्होंने बताया कि मंत्रालय विभिन्‍न राज्‍यों और केन्‍द्र शासित प्रदेशों में हुई प्रगति की लगातार निगरानी कर रहा हैं ताकि राज्‍यों में एक सिंगल यूनिफाइड मंडी, मंडियों के रूप में वैकल्पिक मंडी विकल्‍प, प्रत्‍यक्ष विपणन और कृषक-उपभोक्‍ता मंडियों के परिकल्पित लाभ पूरी चेन की प्रमुख कड़ी यानि किसानों तक पहुंच सकें।
         सिंह ने कहा कि वह मंडियों को खेतों के निकट लाना चाहते हैं जहां पर उचित भंडारण, ग्रेडिंग तथा छंटाई की सभी सुविधाएं उपलब्‍ध हो, जिससे कि परिवहन की लागत कम हो, मजबूरी में उपज बेचने की घटनाएं कम हों तथा साथ ही बिचौलियों की संख्‍या में कमी हो और किसानों को उपभोक्‍ता के रूपए में से ज्‍यादा हिस्‍सा प्राप्‍त हो सके। 
       राधा मोहन सिंह ने कहा कि एक महत्‍वपूर्ण कदम जिसे राज्‍यों द्वारा इस संबंध में उठाया जा सकता है,वह है वेयरहाउसों-साइलोस-कोल्‍ड स्‍टोरेज को मंडी सब्‍यार्ड घोषित करना ताकि किसान अपनी सरप्‍लस उपज का भंडारण कर सकें और उपज को ए.पी.एम.सी. यार्ड तक ले जाए बिना ही सीधा वहीं से बेच सकें।
         उन्होंने कहा कि मंत्रालय वेयरहाउसिंग डेवलप्‍मेंट एंड रेग्‍युलेटरी अथॉरिटी(डब्‍ल्‍यू.डी.आर.ए) के साथ भी बातचीत कर रहा हैं ताकि किसान भी वैज्ञानिक डब्‍ल्‍यूडीआरए के मापदंडों को पूरा करने वाले वेयरहाउसों में भंडारित अपनी उपज के बदले में रेहन ऋण सुविधा(प्‍लेज फायनेंसिंग) का लाभ उठा सकें।

Thursday, 13 July 2017

राष्ट्रीय पशुधन मिशन : कौशल विकास तथा प्रशिक्षण के लिए भी सहायता

          केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री, राधा मोहन सिंह ने राष्ट्रीय पशुधन मिशन (एनएलएम) की  महापरिषद की दूसरी बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि पशुपालन, डेयरी तथा मत्स्यपालन विभाग पशुधन सेक्टर, विशेष रूप से कुकुट, बकरी, भेड़, सूकर, भारवाही पशु इत्यादि जैसी प्रजातियों के धारणीय विकास को राष्ट्रीय पशुधन मिशन कार्यान्वित कर रहा है। 

     राधा मोहन सिंह ने कहा कि एनएलएम गोपशु तथा भैंसों सहित पशुधन सेक्टर के लिए गुणवत्तापूर्ण आहार तथा चारे की उपलब्धता में सुधार करने, जोखिम कम करने तथा विस्तार करने, कौशल विकास तथा प्रशिक्षण के लिए भी सहायता देता है। उन्होंने कहा कि पशुधन पालक तथा किसान, विशेषरूप से महिलाएं, असंगठित हैं, क्योंकि ये गतिविधियां मुख्यत: घरेलू प्रकृति की हैं। तथापि, जुगाली करने वाले छोटे पशुओं विशिष्ट् वैज्ञानिक इस्तक्षेपों के साथ पशुधन पालकों की पौषणिक तथा आजीविका सुरक्षा में सुधार करने के अपार अवसर प्रदान करता है।
         सिंह ने बताया कि एनएलएम की योजना रूप से मिशन-रूप में स्थापित करने का एक कारण राज्यों तथा संघ राज्य क्षेत्रों को उनकी परिस्थितियों के अनुकूल उपयुक्त हस्तक्षेप करने में आवश्यक लचीलापन प्रदान करना है। पशुधन सेक्टर की समग्र अपेक्षाओं को ध्यान में रखते हुए सेक्टर के लिए संसाधनों को बढ़ाने तथा उपयुक्त अभिकेंद्रण के माध्यम से गतिविधियों को एनएलएम के तंत्र के अंतर्गत क्रियाशील बनाने की आवश्यकता है, ताकि राज्यों तथा संघ राज्यों के क्षेत्रों के प्रयासों को उन गतिविधियों का ध्यान रखने के लिए सम्पूरित किया जा सके, जो अन्य चल रही योजनाओं के अंतर्गत समायोजित नहीं किए जा सकते।
           केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि इसके अलावा किसानों तथा पणधारियों की आवश्यकताओं को देखते हुए तथा भौगोलिक और क्षेत्रीय अपेक्षाओं को देखते हुए एनएलएम के अंतर्गत सभी घटकों को लचीला तथा माडयूलर बनाया गया है, ताकि छोटे तथा सीमांत किसान भी एनएलएम के अंतर्गत प्रस्तावित गतिविधियों के लाभ प्राप्त कर सकें। 
        संसाधनों और सब्सिडी के वितरण को एपीएल,बीपीएल लाभार्थियों तथा पूर्वोत्तर क्षेत्र, पहाड़ी, वामपंथी उग्रवाद क्षेत्रों के लाभार्थियों को ध्यान में रखते हुए न्याय संगत बनाया गया है जिससे कि अत्यधिक दयनीय स्थिति के लाभार्थी धारणीय आजीविका हेतु समान लाभ प्राप्त् कर सकें। 
        राष्ट्रीय पशुधन मिशन का आयोजन चार उप-मिशनों के रूप में किया जा रहा है। पशुधन विकास पर उप-मिशन, पूर्वोत्तर क्षेत्र में सूअर विकास पर उप-मिशन, आहार एवं चारा विकास पर उप-मिशन, कौशल विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और विस्तार पर उप-मिशन। बैठक में एनएलएम के उप-मिशनों के विभिन्न घटकों पर एक विस्तृत प्रस्तुति दी गयी। 
      राधा मोहन सिंह ने ने कहा कि विभिन्न कार्यक्रमों के सुचारू कार्यान्वयन और हस्तक्षेपों को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए यह अनिवार्य है कि दिशा निर्देशों का बारीकी से निर्धारण किया जाये। उद्यमशीलता विकास एवं रोजगार सृजन (ईडीईजी) के तहत 32,981 लाभार्थियों की सहायता की गयी है।
        ग्रामीण घरेलू कुकुट विकास के तहत 3.68 लाख लाभार्थियों का वित पोषण किया गया है। 64 लाख पशुओं का बीमा किया गया।बकरियों और 9.80 लाख सूकरों को स्वास्थ्य सहायता दी गयी। 41 कुकुट-भेड़-बकरी-सूकर प्रजनन फार्मों की सहायता की गयी।
           54,930 चारा कटाई यंत्र विकसित किए गये। 96,321 क्विंटल बीज वितरित किए गये। 3823 साइलेज यूनिटों की स्थापना की गयी।
        519 पशुधन मेलों के आयोजन को सहायता दी गयी। 223 पशुधन किसान समूह और 121 किसान फील्ड स्कूल स्थापित किए गये। 8420 किसानों को प्रदर्शनी दौरों के तहत कवर किया गया।

Wednesday, 12 July 2017

दक्षिण एशिया का वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान

      प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में मंत्रिमंडल की यहां हुई बैठक में वाराणसी में राष्ट्रीय बीज अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केन्द्र (एनएसआरटीसी) परिसर में अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) का दक्षिण एशिया क्षेत्रीय केन्द्र (अईएसएआरसी) स्थापित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई।

      इसके तहत वाराणसी में चावल में मूल्य संवर्द्धन के लिए एक उत्कृष्टता केन्द्र स्थापित किये जाने का प्रस्ताव है। इसमें एक आधुनिक प्रयोगशाला भी होगी जिसमें चावल और पुआल में भारी घातुओं की गुणवत्ता और स्तर का पता लगाने की क्षमता होगी।
        यह केन्द्र चावल के विभिन्न उत्पादों की श्रृंखला को सशक्त बनाने के लिए हितधारकों के क्षमता विकास केन्द्र के रूप में भी कार्य करेगा। पूर्वी भारत में यह पहला अंतरराष्ट्रीय केन्द्र होगा जो इस क्षेत्र में सतत चावल उत्पादन और कौशल विकास के क्षेत्र में वरदान साबित होगा। इसके साथ ही दक्षिण एशिया और अफ्रीकी देशों के लिए भी यह खाद्यान उत्पादन और कौशल विकास के क्षेत्र में अहम भूमिका निभाएगा।
       केन्द्र के लाभ यह केन्द्र भारत की समृद्ध जैव विविधता का इस्तेमाल कर चावल की उन्नत किस्में विकसित करने में मददगार होगा। यह देश में प्रति हेक्टेयर अधिक उपज प्राप्त करने के साथ ही उनमें पोषक तत्वों में वृद्धि में भी सहायक बनेगा। इससे देश के खाद्य एंवम पौष्टिक सुरक्षा के मुद्दों को सुलझाने में मदद मिलेगी। यह देश में उत्पादों की विभिन्न श्रृंखलाओ वाली उत्पादन प्रणाली को सहारा देगा। यह उपज के नुकसान को कम करने और उपज के मूल्य सर्वधन के जरिए किसानों की आय बढ़ाने में सहायक बनेगा। 
          इससे पूर्वी भारत के किसान सबसे ज्यादा लाभान्वित होंगे। दक्षिण एशिया और अफ्रीकी देश के किसानों को भी इसका लाभ मिलेगा। आईएसएआरसी का प्रबंधन आईएसएआरसी आईआरआरआई के न्यासी बोर्ड द्वारा संचालित होगी। आईआआरआई अपने सदस्य को निदेशक के तौर पर नियुक्त करेगी। आईआरआरआई के महानिदेशक की अध्यक्षता वाली समन्वय समित केन्द्र के अध्यक्ष के तौर पर काम करेगी। 
         इसके साथ ही भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के सचिव इस केन्द्र के सह अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए जाएंगे। पादप विज्ञान के महानिदेशक,कृषि अनुसंधान परिषद् के निदेशक, एनएसआरटीसी, आईआआरआई के भारत में प्रतिनिधि,उत्तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि और नेपाल,बंगलादेश तथा निजि क्षेत्र के प्रतिनिधि इसके सदस्य होंगे।
        केन्द्र की स्थापना के लिए डीएससीएंडडब्ल्यू तथा फिलीपीन्स के आईआरआरआई के बीच एक समझौता पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। डीएसीएंडडब्ल्यू केन्द्र में प्रयोगशाला,कार्यालय,प्रशिक्षण कक्षाओं सहित सभी आधारभूत सुविधाओं के साथ ही वाराणसी में एनएसआरटीसी में भूमि भी उपलब्ध कराएगा। यह केन्द्र के छह महीने के भीतर काम करना शुरु कर देगा।

Tuesday, 4 July 2017

जम्मू एवं कश्मीर के पंपोर,पुलवामा में केसर पार्क, लागत 24.55 करोड़

       केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि सरकार, भारतीय अर्थव्यवस्था के सतत् विकास के लिए प्रतिबद्ध एवं क्रियाशील है। कृषि जगत से संबंधित उद्यमों का विकास कर, जिसमें उत्पादों का भण्डारण तथा उसका प्रसंस्करण कर बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों को लाकर भारत को दुनिया के प्रमुख आर्थिक शक्तियों वाले देश में शामिल कर सकते हैं।

     कृषि मंत्री ने यह बात श्रीनगर में किसानों को सम्बोधित करते हुए कही। सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी, कृषि की अहम भूमिका और इसके अर्थव्यवस्था में योगदान से भलीभांति परिचित हैं। अत: उन्होंने किसानों की भलाई हेतु बहुत सारी योजनाओं का सृजन एवं शुभारम्भ किया है। पिछले 03 वर्षों में जिन नई योजनाओं की शुरूआत की गई उसमें, स्वॉयल हेल्थ कार्ड, सिंचाई सुविधाओं में विस्तार, जैविक खेती, राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-नाम), बागवानी विकास, कृषि वानिकी, मधुमक्खी पालन, दूध, मछली और अंडा उत्पादन के साथ-साथ कृषि शिक्षा आदि क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर शामिल किया गया है। 
        राधा मोहन सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फरवरी 2016 में बरेली में वर्ष 2022 तक किसान की आय को दोगुना करने का सपना देखा था। जिसके लिए उन्होंने नई योजनाओं का न केवल सूत्रपात किया बल्कि आवश्यक धन भी उपलब्ध कराया। सरकार ने पिछले 3 वर्षों में कारगर रणनीतियों को अपनाकर कृषि उपज एवं किसानों की आय बढ़ाने के लिए 5 प्रमुख विषयों पर कार्य किया हैं। नीम कोटेड यूरिया का उत्पालदन करना, जैविक खेती को बढ़ावा देकर कृषि उत्पादन लागत को कम किया है। 
      सरकार ने डीएपी की 2,500 रुपये और एमओपी की 5,000 रुपये प्रति टन मूल्य घटा दिया है। 3 दिन पहले ही, दिनांक 01 जुलाई, 2017 को उर्वरकों पर जीएसटी को 12ऽ से घटाकर 5ऽ कर दिया गया जिससे इनके मूल्यों में भारी गिरावट आएगी। उत्पादन बढ़ाने हेतु मृदा स्वास्थ्य कार्ड, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत हर खेत को पानी और परम्परगत कृषि विकास योजनाओं को लागू कर उत्पादन लागत को कम करना है। किसानों को देशव्यापी एवं पारदर्शी बाजार उपलब्ध कराने हेतु सरकार ने ई-नाम की शुरूआत कर दी है। 
       इसी तरह पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, बागवानी, कृषि वानिकी, मुर्गी पालन, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, 'हर मेड़ पर पेड़' पर सरकार ने कई सारे कार्यक्रमों की शुरूआत की। सिंह ने कहा कि वैसे तो जम्मू एवं कश्मीर में खाद्य उत्पादन आवश्यकता से कम होता है जिससे राज्य को हर वर्ष लगभग 7 लाख मीट्रिक टन अनाज आयात करना पड़ता है। 
       मुख्य रूप से भौगोलिक और जलवायु परिस्थितियों के कारण ऐसा होता है क्योंकि, अधिकांश क्षेत्रों में केवल एक फसल ही उगाई जाती है। इसका एक अन्य कारण यहाँ के छोटे-छोटे खेत हैं। अत: उत्पादन एवं मांग के अंतर को कम करने के लिए राज्य सरकार खाद्य एवं अन्य फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए मजबूत प्रयास कर रही है। 
       उन्होंने कहा कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए राज्य, केंद्र द्वारा वित्त पोषित कई योजनाओं को सार्थकपूर्वक लागू कर रहा है। आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान जम्मू एवं कश्मीर ने धान, मक्का, सब्जियों और केसर जैसे कुछ महत्वपूर्ण फसलों के उत्पादन स्तर को बढ़ाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। 
      केन्द्रीय कृषि मंत्री ने बताया कि भारत सरकार ने 7 नवंबर, 2015 को जम्मू और कश्मीर के क्षतिग्रस्त बागवानी क्षेत्रों के पुनर्वास और विकास के लिए 500 करोड़ रुपये का विशेष पैकेज घोषित किया था, जिसके लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने 2016-19 के लिए अपनी योजना पेश कर दी है। 
       राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड को 24.55 करोड़ रुपये की कुल लागत पर पंपोर, पुलवामा में केसर पार्क स्थापित करने का कार्य सौंपा गया है। पार्क में गुणवत्ता नियंत्रण प्रयोगशाला, निर्यात संवर्धन गतिविधि और ई-नीलामी केंद्र की सुविधा होगी। 
      पार्क नवंबर, 2017 तक शुरू होने की संभावना है। पिछले दो वर्षों (2015-16 और 2016-17) के दौरान, मुख्यमंत्री की पहल और केंद्र प्रायोजित योजनाओं के समर्थन से राज्य ने कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की है।

Monday, 3 July 2017

कृषि यंत्रीकरण के लिए 3088 करोड़ से अधिक की राशि

        केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि कृषि यंत्रीकरण कृषि क्षेत्र के सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण घटको में से एक है, जो समय पर कृषि कार्यों के माध्यम से उत्पादन वृद्धि में मदद करता है, घाटे को कम करता है, मंहगे आदानों का बेहतर प्रबंधन सुनिश्चित करने के माध्यम से विभिन्न कृषि कार्यो की लागत कम करने, प्राकृतिक संसाधनों की उत्पादकता में वृद्धि और विभिन्न कृषि कार्यो से जुड़ी दिक्कतों को कम करने मे मदद करता हैं। 

          केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने यह बात शेर ए कश्मीर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन केंद्र में आयोजित संसदीय परामर्शदात्री समिति की अंतर सत्र बैठक में कही। इस बैठक के दौरान चर्चा के लिए चुना गया विषय था- ‘कृषि यंत्रीकरण'। इस मौके पर केन्द्रीय कृषि राज्य मंत्री, सुदर्शन भगत और परामर्शदात्री समिति के सदस्य, उपस्थित थे।
           कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में शिफ्ट मैकेनिकल और बिजली स्रोतों के उपयोग की दिशा में रहा है, जबकि 1960-61 में लगभग 92.30ऽ कृषि कार्यो मे उपयोग होने वाली शक्ति सजीव (प्राणीअमानवीय) स्रोतों से आ रही थी। 2014-15 में सजीव शक्ति स्रोतों का योगदान घटकर लगभग 9.46ऽ रह गया है और यांत्रिक और विद्युत स्रोतों की शक्ति का योगदान 1960-61 मे जो 7.70ऽ था, बढ़कर 2014-15 में लगभग 90.54ऽ हो गया है। 
      सिंह ने कहा कि कृषि यंत्रीकरण का स्तर खेती योग्य इकाई क्षेत्र मे उपलब्ध यांत्रिक शक्ति के अनुपात के रूप में व्यक्त किया जाता है, जो भारत में पिछले 43 वर्षो के दौरान बहुत धीमी गति अर्थात 1975-76 मे जो 0.48 किलोवाट प्रति हेक्टेयर था, वर्ष 2013-14 में बढ़कर 1.84 किलोवाट प्रति हेक्टेयर हो गया है। हालांकि, 2014-15 से 2016-17 के दौरान यह बढ़कर 2.02 किलोवाट-हेक्टेयर हो गया है जो मुख्यरूप से कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के केंद्रित प्रयासों के कारण है। 
           कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने कहा कि इस वर्ष अनाज मे मामले मे रिकॉर्ड उत्पादन हासिल किया है। हालांकि, अनाज की मांग बढ़ रही है और अनुमान लगाया गया है कि 2025 तक हमें 300 मिलियन टन से ज्यादा उत्पादन करना होगा। 2011 की जनगणना के अनुसार, 263 मिलियन लोग (54.6ऽ) कृषि क्षेत्र से जुड़े हुए हैं जो 2020 तक घटकर 190 करोड़ (33ऽ) रह जाने की संभावना व्यक्त की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह आंकड़े दर्शाते है कि कृषि कार्यो के महत्वपूर्ण सीजन जैसे कि बुवाई और कटाई हेतु श्रमिकों की कमी होगी और इसका उत्पादन पर प्रतिकूल असर होगा।
          इस प्रकार, विभिन्न कृषि कार्यो के लिए ऊर्जा की अतिरिक्त मांग को कृषि मशीनीकरण के माध्यम से पूरा किया जाना होगा और इसके लिए कृषि यंत्रीकरण सेक्टर को तेजी से बढ़ने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि औसत जोत आकार में निरंतर संकोचन के कारण, अधिक खेत प्रतिकूल श्रेणी में आ जाएंगे जिससे कृषि मशीनरी की व्यक्तिगत स्वामित्व को धीरे-धीरे और अधिक अनौपचारिक बना देगा। इसलिए छोटे खेतों के लिए पर्याप्त कृषि शक्ति की उपलब्धता सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती होगी।
         कृषि यंत्रीकरण क्षेत्र की अन्य चुनौतियां ये हैं कि कैसे कौशल बाधाओं को दूर किया जाएँ ताकि आधुनिक प्रौद्योगिकी को पर्याप्त रूप से समर्थन प्राप्त हो। भविष्य मे जीवाश्म ईंधन की कम उपलब्धता और उस पर अधिक लागत के कारण ऊर्जा की कमी और पर्यावरणीय गिरावट की उपेक्षा किए बिना कृषि यंत्रीकरण का सतत विकास सुनिश्चित करने की संभावनाओ का संपर्क स्थापित करना आवश्यक होगा। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री ने बताया कि वर्ष 2012-13 एवं वर्ष 2013-14 मे कृषि यंत्रीकरण पर दो छोटी स्किमे चलाई जा रही थी जिसके लिए आबंटन क्रमशः मात्र रुपये 24.10 करोड़ एवं 38.49 करोड़ मात्र था।
           परन्तु कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा कृषि यंत्रीकरण के महत्व को ध्यान में रखकर देश मे कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वर्ष 2014-15 से कृषि यंत्रीकरण उपमिशन प्रारम्भ किया गया है, जिसका उदेश्य छोटे और सीमान्त किसानो तथा उन क्षेत्रो मे जहां कृषि यंत्रो की उपलब्धता कम है, वहाँ कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देना है।
      कृषि यंत्रीकरण उपमिशन (एस एम् ए एम्) के अतिरिक्त, एन एफ एस एम्, आर के वि वाई, आयल पाम मिशन, बागवानी मिशन इत्यादि स्कीमो में भी मशीनीकरण हेतु राज्यों को सहायता प्रदान की जाती है सिंह ने कहा कि कृषि यंत्रीकरण उपमिशन मे न केवल प्रशिक्षण, परीक्षण, कृषि मशीनरी के प्रदर्शन और खरीद सब्सिडी जैसे पारंपरिक घटक शामिल है, बल्कि इसमें कस्टम हायरिंग के लिए फार्म मशीनरी बैंको और उच्च उत्पादक उपकरण केंद्र की स्थापना और छोटे और सीमांत किसानों के बीच उत्पादकता बढ़ाने और उपयुक्त खेत उपकरणों का स्वामित्व का निर्माण करने के उद्देश से चयनित गांवों में कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देना शामिल हैं।
           राष्ट्रीय कृषि विकास योजना और कृषि यंत्रीकरण उपमिशन के अंतर्गत कस्टम हायरिंग सेवाओं के लिए फार्म मशीनरी बैंकों और हाई-टेक हब की स्थापना हेतु परियोजना लागत का 40ऽ वित्तीय सहायता दी जाती है। उन्होंने बताया कि विभाग के इन विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत कृषि यंत्रीकरण के लिए राज्य सरकारों को पिछले तीन वर्षों में 3088 करोड़ रुपये से अधिक की राशि आवंटित की गई हैं। 
         चालू वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान, कृषि यंत्रीकरण उपमिशन के लिए आवंटन पिछले वर्ष की तुलना में दो गुना बढ़ा दिया गया है जो 577 करोड़ रूपए है। आबंटित राशि का उपयोग करके, यह देखा गया है कि मध्य प्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, हिमाचल प्रदेश, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यों ने कृषि यंत्रीकरण क्षेत्र में अच्छी प्रगति हासिल की है।

Sunday, 2 July 2017

दुनिया में 75 मिलियन परिवार प्राकृतिक रेशों के उत्पादन में शामिल

      केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए प्राकृतिक रेशों की क्षेत्र समग्र वृध्दि बहुत महत्वपूर्ण है। 

     समाज के विकास के लिए उनका आर्थिक महत्व और गहरा प्रभाव है। कृषि मंत्री ने यह बात टेक्सटाइल इंडिया 2017, गांधीनगर, गुजरात में कही। कृषि मंत्री ने कहा कि प्राकृतिक रेशा भारतीय वस्त्र उद्योग की रीढ़ है। वे रेशा उद्योग के कुल 60ऽ से अधिक का भाग है। कृषि उद्योग के पश्चात भारतीय वस्त्र उद्योग लाखों लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है।
          लघु और मध्यम उद्योग प्राकृतिक रेशों के उप-उत्पादों का उपयोग करते है । दुनिया भर में 75 मिलियन से अधिक परिवार प्राकृतिक रेशों के उत्पादन में सीधे शामिल है। भारत में 30 लाख किसान प्राकृतिक रेशों के उत्पादन में शामिल है। कृषि मंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में प्राकृतिक रेशों को ऐक्रेलिक, पॉलिएस्टर, इत्यादि जैसे कृत्रिम रेशों से कठोर प्रतिस्पर्धा और चुनौती का सामना करना पड़ रहा हैप्र् एक सदी पहले इस्तेमाल में लाए जाने-वाले रेशें केवल प्राकृतिक ही हुआ करते थे जबकि अब इनका हिस्सा 40ऽ से कम पाया गया है। 
     सन 1990 के दौरान अकेले कपास का योगदान 50ऽ रहा। तथापि, वर्तमान में विश्व परिधान बाजार में कपास का योगदान 30ऽ से भी कम हो गया है। उन्होंने कहा कि संश्लेषित रेशें अपने लागत लाभ एवं ज़रूरत के अनुरूप गुणों के कारण प्राकृतिक रेशों के प्रमुख अनुप्रयोगों के क्षेत्रों में तेजी से अपनी पकड़ बना रहा हैं। संश्लेषित रेशों की तुलना में प्राकृतिक रेशों के उत्पादन की लागत बहुत ज्यादा है।
        तेजी से बढती हुई आबादी को मद्दे नज़र रखकर सभी देश तन्तु फसलों से ज्यादा खाद्य फसल खेती का कृषि क्षेत्र बढ़ाने को महत्त्व दे रहे हैं। इसके बावजूद, बढती हुई लोकसंख्या तथा जनता में पर्यावरणानुकूल प्राकृतिक रेशों के प्रति बढ़ती जागरूकता की वजह से प्राकृतिक रेशों की मांग भी बढ़ रही है। प्राकृतिक रेशों का कृषि क्षेत्र सीमित होने के कारण उनकी उपलब्धता बढ़ाने के लिये एक ही रास्ता है, उनकी उत्पादकता बढ़ाना। 
        कृषि मंत्री ने बताया कि वर्तमान में 90 देश कपास का उत्पादन कर रहे है । भारतीय वस्त्र उद्योग के कुल रेशों की खपत का 60ऽ भाग कपास का है जो कि वैश्विक परिदृश्य के शेयर से 40ऽ कम है।  भारत दुनिया में कपास का प्रमुख उत्पादक है जो विश्व का लगभग एक-तिहाई और वैश्विक उत्पादन का एक चौथाई हिस्सा है। वर्ष 2016-17 के दौरान भारत ने 10.5 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से 5.8 मिलियन टन कपास का उत्पादन किया जिसकी उत्पादकता लगभग 550 किलो लिंट-हेक्टेयर की पायी गई।
        कपास की उत्पादकता बढ़ाने हेतु उच्च उपज देने वाले किस्मों, उत्तम कृषि-विज्ञान पध्दतियाँ और अभिनव प्रौद्योगिकियों की नितांत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि औद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण प्राकृतिक रेशों में से एक है जूट। जूट की खेती व उद्योग-व्यापार से लगभग 50 लाख लोगों को आजीविका प्राप्त होती है। 
        वर्तमान में जूट को भू-क्षरण नियंत्रित करने हेतु भू-वस्त्र स्वरुप तथा ऑटोमोबाइल क्षेत्र में कार के इंटीरियर हिस्सों का निर्माण आदि में तकनीकी वस्त्र के नव अनुप्रयोगों में सफलता हासिल हो रही है। आनेवाले समय में जूट और सिसल रेशों से निर्मित प्राकृतिक भू-वस्त्रों की मांग में नियमित वृद्धि अनुमानित की जा रही है। रेशों के अलावा इस की खेती से कार्बन सिक्वेस्टरिंग क्षमता, बेहतर मृदा स्वास्थ्य और किसानों को बेहतर अर्थापार्जन आदि फायदे प्राप्त होते हैं। भारत में जूट की औसत उत्पादकता लगभग 2300-2400 किलोग्राम रेशा-हेक्टेयर है। 
        हमारी उत्पादकता का स्तर बांग्लादेश से बेहतर तो है पर उत्पादकता में वृध्दि लाने की और भी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि विश्व की व्यवसायिक रेशेदार फसलो में सन चौथे स्थान पर है। यह सभी कपडा रेशों की तुलना में सबसे अधिक प्राकृतिक और पर्यावरण के अनुकूल है। भारत में सन रेशे के तहत क्षेत्र और कुल उत्पादन बहुत कम है इसका मुख्य कारण उपज देने वाली किस्मों की अनुपलब्धता और उत्पा्दन प्रौद्योगिकी की अनुपलब्धता है। 
         भारत में सभी कपडों के निर्माता हर साल 60 करोड रूपए के मूल्य में यूरोपीय देशो से सन रेशे का आयात करते है। इसलिए देश की प्राथमिक आवश्यकता घरेलू बाजार में गुणवत्ता वाले रेशों के स्थिर प्रवाह को सुनिश्चित करने और वस्त्र उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर उत्पादन और प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के साथ समर्थित संगठित सन की खेती के तहत एक महत्वपूर्ण क्षेत्र का विकास करना है।

दुनिया का सबसे बड़ा जेवर एयरपोर्ट

दुनिया का सबसे बड़ा जेवर एयरपोर्ट    जेवर (गौतम बुद्ध नगर)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज यहाँ कहाकि बेटी तो बेटी ही होती...