Sunday, 7 March 2021

मॉरीशस के कई उत्पाद अब भारतीय बाजार में बिकेंगे

    भारत-मॉरीशस के बीच समझौता हुआ। इसके तहत भारतीय बाज़ारों में अब मॉरीशस के बेहतरीन उत्पाद उपलब्ध होंगे। भारत सरकार में वाणिज्य सचिव डॉ.अनूप वधावन और मॉरीशस के राजदूत और विदेश मामलों, क्षेत्रीय एकीकरण और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मामलों के सचिव हय्मनदिल डिलम ने पोर्ट लुई में भारत-मॉरीशस व्यापक आर्थिक सहयोग और साझेदारी समझौते (सीईसीपीए)पर हस्ताक्षर किए। समझौता मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्नाथ, और भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर की मौजूदगी में हुआ।

     

   भारत द्वारा अफ्रीका के किसी देश के साथ सीईसीपीए पहला व्यापार समझौता है। यह एक सीमित समझौता है, जो बिजनेस में वस्तुओं, मूल नियमों, सेवाओं, बिजनेस में तकनीकी बाधाओं (टीबीटी), स्वच्छता और फाइटोसैनिटेरी (एसपीएस) उपायों, विवाद निपटाने, व्यक्तियों के सामान्य तरीके से आने-जाने, दूरसंचार, वित्तीय सेवाओं, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं और अन्य क्षेत्रों में सहयोग करेगा।

    असर और फायदे :सीईसीपीएदोनों देशों के बीच व्यापार को प्रोत्साहित करने और उसे बेहतर बनाने और एक संस्थागत तंत्र के रूप में काम करने का मौका देगा। सीईसीपीए के तहत भारत की 310 निर्यात वस्तुएं शामिल होगी। जिसमें खाद्य सामग्री और पेय पदार्थ (80 उत्पाद), कृषि उत्पाद (25 उत्पाद), कपड़ा और टेक्सटाइल से बने उत्पाद (27 उत्पाद), आधार धातु और उससे जुड़ी अन्य वस्तुएं (32 उत्पाद), इलेक्ट्रिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक वुस्तएं (13 उत्पाद), प्लास्टिक और रसायन (20 उत्पाद), लकड़ी और उससे बने उत्पाद (15 उत्पाद)और अन्य उत्पाद शामिल हैं। इसी तरह मॉरीशस के 615 उत्पादों को भारतीय बाजार में प्राथमिकता मिलेगी, जिसका उसे फायदा मिलेगा। इसके तहत फ्रोजेन मछली, स्पेशलाइज्ड चीनी, बिस्कुट, ताजे फल, रस, मिनरल वॉटर, बीयर, अल्कोहल ड्रिंक, साबुन, बैग, चिकित्सा और शल्य चिकित्सा उपकरण और कपड़े शामिल हैं।

    इसी तरह सेवा क्षेत्र में भारतीय कंपनियों की मॉरीशस के 11 प्रमुख क्षेत्रों के लगभग 115 सब-सेक्टर तक पहुंच बनेगी। जिसमें पेशेवर सेवाएं, कंप्यूटर से संबंधित सेवाएं, अनुसंधान और विकास, अन्य व्यावसायिक सेवाएं, दूरसंचार, वित्तीय, वितरण, शिक्षा, पर्यावरण, पर्यटन और यात्रा, मनोरंजन, योग, ऑडियो-विज़ुअल सेवाएं और परिवहन सेवाएं देने का फायदा भारतीय कंपनियों को मिलेगा।

    भारत ने भी इसी तरह 11 प्रमुख सेवा क्षेत्रों के लगभग 95 सब-सेक्टर को मॉरीशस की कंपनियों के लिए खोले हैं। जिनमें पेशेवर सेवाएं, अनुसंधान और विकास, अन्य व्यावसायिक सेवाएं, दूरसंचार, वित्तीय, वितरण, उच्च शिक्षा, पर्यावरण, स्वास्थ्य, पर्यटन और यात्रा से संबंधित सेवाएं, मनोरंजन और परिवहन सेवाएं शामिल हैं।

    दोनों पक्ष समझौते पर हस्ताक्षर करने के दो साल के भीतर सीमित संख्या में अति संवेदनशील उत्पादों के लिए एक स्वचालित ट्रिगर सुरक्षा तंत्र(एटीएसएम)पर बातचीत करने के लिए भी सहमत हुए हैं।

     समय सारिणी:यह समझौता जल्द ही लागू होगा।

   सीईसीपीए, भारत-मॉरीशस के बीच पहले से ही मौजूद गहरे और खास संबंधों को और मजबूत करेगा।

बौद्धिक संपदा में बहुत पिछड़ा है भारत... !

    स्वर्णिम इतिहास रहा है भारत का, यह निर्विवाद है। पर कड़वा सच यह भी है कि आधुनिक युग में विकास-उन्नति के जो पैमाने हैं उनकी कसौटी पर हम खरे नहीं उतरते। बौद्धिक संपदा अर्थात इंटेलेक्च्युअल प्रापर्टी (आईपी) के वैश्विक मानचित्र में भारत देश को ढूंढ़ने के लिए एक अदद दूरबीन की आवश्यकता पड़ती है। विश्व का दूसरा सबसे बड़ी आबादी वाला देश होते हुए भी बौद्धिक संपदा में 'गरीबी रेखा' से नीचे के स्तर पर भारत का होना स्वसिद्ध है।

   

    डिजिटलीकरण, आविष्कार और टेकनाॅलाॅजी में हम अपने को अपमानजनक स्थिति में पाते हैं, क्योंकि इनका सीधा संबंध बौद्धिक संपदा से है। चीन, अमेरिका, जर्मनी, जापान तो हैं हीं, द.कोरिया जैसे देश आईपी के क्षेत्र में बहुत बहुत आगे निकल चुके हैं और हम इधर से फार्मूला ले आए तो उनकी बूढ़ी पड़ गई टेकनाॅलाॅजी को अपनाकर समृद्धता का पहाड़ा पढ़ते चले आए, कहीं की वित्तीय प्रणाली तो किसी मुल्क का आर्थिक माॅडल भा गया, किसी की शिक्षा पद्धति की काॅपी करके देश को आगे बढ़ाने के मौके देने का सिलसिला अब भी यथावत जारी रखे हैं। उधारी की तकनीक अपनाना आसान है परंतु खुद का शोध-अनुसंधान करने में पूंजी, श्रम और धैर्य लगाने की आदत डाले बिना ऐसे ही चलेगी अपनी गड्डी।

    आईपी अधिकारों के संरक्षण के लिए संयुक्त राष्ट्र् ने 1967 में वर्ल्ड इंटेलेक्च्युअल प्राॅपर्टी ऑर्गनाइजेशन की स्थापना की थी। पिछले पांच दशकों में जागरूक देश कहां से कहां जा पहुंच गए। दुनिया के 151 देशों की संकलित सूचनाओं का विश्लेषण बताता है कि साल 2019 के दौरान विश्व में कुल 15 लाख पेटेंट दिए गए, इनमें से सर्वाधिक 30 फीसद या 445280 पेटेंट चीन के खाते में आए, 23.62 फीसद हिस्सेदारी के साथ या 354430 पेटेंट लेकर अमेरिका दूसरे पायदान पर, 12 फीसद अर्थात 179910 पेटेंट प्राप्त कर जापान तीसरे नंबर पर रहा, द.कोरिया 8.37 फीसद या 125661 पेटेंट और यूरोप को 137782 पेटेंट गए। 2018 की तुलना में 2019 में दिए गए पेटेंट की कुल संख्या में 5.5 फीसद इजाफा दर्ज किया गया।

     ऑर्गनाइजेशन के आकड़ों के अनुसार 2019 में पेटेंट के लिए विश्व भर में कुल 3224200 आवेदन किए गए जोकि साल 2018 में किए गए कुल 3325400 आवेदनों के मुकाबले 3 फीसद कम रहे। यह गिरावट चीनियों द्वारा किए गए आवेदनों की संख्या में आई भारी कमी के कारण हुई। पिछले 24 सालों में पहली बार चीनियों द्वारा किए गए आवेदनों में गिरावट आई। चीन को अलग करके देखें तो 2019 में विश्व में किए गए कुल पेटेंट आवेदनों की संख्या में 2.3 फीसद की बढ़ोतरी पाई गई। इस आकड़े से वैश्विक स्तर पर चीन का वजन, रुतबा आसानी से समझा जा सकता है।

     चीन की फर्राटेदार तरक्की का इतिहास कोई सदियों का नहीं सिर्फ तीन दशकों में सिमटा है, आज भी हम पसंघा ही हैं, अपने को तुर्रमशाह समझें तो समझते रहें। यही स्थिति औद्योगिक डिज़ाइन और पौधों की नई किस्मों के लिए वैश्विक स्तर पर 2019 में क्रमश: 1360900 व 21430 आवेदन किए गए जो 2018 में क्रमश:1343800 और 19880 के मुकाबले में 1.3फीसद व 7.8 फीसद अधिक हैं। 2019 में कुल पेटेंट आवेदनों (3224200) में करीब 14 लाख आवेदन चीन से, अमेरिका से 6.21 लाख, जापान से 3.07 लाख, द.कोरिया से 2.18 लाख और यूरोप से 1.81 लाख आवेदन किए गए।

     विश्व में कुल आवेदनों में 84 फीसद से भी अधिक आवेदन सिर्फ इन पांच देशों के हैं। अपने देश में कृषि, औद्योगिक , जैव, स्वास्थ, भूगर्भ, सामुद्रिक और यहां तक कि वित्त-बैंकिंग क्षेत्र में रिसर्च संस्थान सक्रिय हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर विदेशी ढांचे को हूबहू लाकर अपने यहां के नियामकीय संस्थानों को देसी लिबास ओढ़ाकर खड़ा करने की परंपरा रही है। इतने विशाल भारत सिर्फ और सिर्फ चार मेट्रो शहरों- मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और दिल्ली में पेटेंट कार्यालय खुले हुए हैं।

    देश में आईपी से संबंधित समग्र क्रियाकलाप महानियंत्रक के अधीन रहते हैं, महानियंत्रक एक आईएएस अधिकारी होता है। आईपी महानियंत्रक वाणिज्य मंत्रालय के औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग के अंतर्गत आता है।‌‌ कहने को अपने देश की आबादी 138 करोड़ है, इस पर बमुश्किल 53627 पेटेंट आवेदन आए 2019 में, मतलब -प्रति 25733 व्यक्ति पर 1 आवेदन का औसत आया। 144 करोड़ की आबादी पर प्रति 1028 व्यक्ति पर औसतन 1आवेदन, अमेरिका की आबादी 33 करोड़ है और 532 व्यक्ति का औसत, जापान की आबादी 13 करोड़, 423 व्यक्ति का औसत और 5.12 करोड़ आबादी वाला द.कोरिया में मात्र 234 व्यक्ति के औसत से 1आवेदन आया। जर्मनी से कुल 67434 आवेदन, रूस से 35511, कनाडा से 36488 और आस्ट्रेलिया से 29758 पेटेंट आवेदन 2019 में किए गए।

     भारत पेटेंट स्वीकृति के मामले में लगातार चार वर्षों से आशातीत प्रदर्शन करता आ रहा है। यह पेटेंट देने के मामले में 2018 में विश्व के 150 देशों की सूची में 10वें पायदान पर था। 2019 में 69.5 फीसद की बढ़त दर्ज करते हुए उछलकर 9वें स्थान पर पहुंच गया, जर्मनी वैश्विक रैंकिंग में 2018 में 9 वें स्थान से बढ़ कर 2019 में 7 वें पायदान पर आ टिका।

      विश्व में लागू कुल पेटेंट की संख्या 2018 के मुकाबले 7 फीसद इजाफे के साथ 2019 में 1.5 करोड़ पार कर गई, सर्वाधिक 31 लाख पेटेंट अमेरिका में, 27 लाख पेटेंट चीन में और 21 लाख पेटेंट जापान में लागू हैं, भारत में लागू पेटेंटों की संख्या 76556 है। पेटेंट कार्यालय सूत्रों का कहना है कि स्टाफ काफी कम होने से कार्यदबाव जरूरत से ज्यादा रहता है, पे पैकेज असंगत है। कर्मियों के प्रमोशन की नीतियां त्रुटिपूर्ण हैं और पक्षपात तो बहुत है।

     आईपी क्षेत्र के बारे में देश में जागरूकता का नितांत अभाव तो है। बताया गया कि आवेदकों से फीस की दर तर्कसंगत नहीं है, इससे आवेदक हतोत्साहित होते हैं। प्रचुर वित्तीय संसाधनों के होते हुए ये समस्यायें नहीं होनी चाहिए। 2017-18 में 153.58 करोड़ रु. और 2018-19 में 188.31 करोड़ रु.के कुल खर्च की तुलना में आईपी महानियंत्रक कार्यालय को उक्त 2 वर्षों में क्रमश:769.73 करोड़ रु. और 862.93 करोड़ रु. का राजस्व प्राप्त हुआ, बचने वाली धनराशि कहां जाती है?

     प्रणतेश नारायण बाजपेयी

चीन लांच करेगा दुनिया की पहली डिजिटल करेंसी

     डिजिटल मुद्रा पर इन दिनों कई देशों का ध्यान केंद्रित चल रहा है। विश्व के 70 फीसद केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा को अपनाने की दिशा में प्रयासरत हैं। इधर पड़ोसी चीन 'डिजिटल युआन' को लाॅंच करने की तैयारी में पूरी जोरदारी से जुटा है। चीन पिछले पांच महीनों में ताबड़तोड़ परीक्षण करते हुए 'डिजिटल मुद्रा की दौड़' में फ्रंट रनर बन गया है। अमेरिका के फेडरल रिज़र्व के प्रमुख जे.पाॅवेल हाल ही में संसदीय समिति के समक्ष 'डिजिटल डाॅलर' पर अमेरिकी रुख का स्पष्ट संकेत दे चुके हैं।

 

  यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ईसीबी), स्वीडन, नाॅर्वे, स्विट्जरलैंड, कंबोडिया सहित कई देश अपनी डिजिटल मुद्रा शुरू करने के प्रयास में लग गए हैं। चीन के सघन प्रयासों को देखते हुए अनुमान सहज ही लगाया जा रहा है कि आधिकारिक (सार्वभौम) डिजिटल मुद्रा लांच करने वाला प्रथम देश चीन ही होगा। असल में कई सालों से चीन अमेरिकी डाॅलर के समकक्ष अपनी मुद्रा खड़ा करने की कोशिश में लगा हुआ है।

    क्रिप्टोकरेंसी के प्रचलन में आने के बाद नया रास्ता खुल गया। इस दिशा में चीन की पहले की अधूरी महत्वाकांक्षा में 2018-19 में फिर उफान उठा। पीपल्स बैंक आॅफ चाइना (चीन का केंद्रीय बैंक) वहीं के 20 बड़े काॅमर्शियल बैंकों के साथ मिलकर डिजिटल मुद्रा के अभियान में पूरे दमखम से जुट गया है। बैंक ने इस परियोजना को त्वरित गति देने के 2017 में डिजिटल करेंसी रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थापित किया था,जिसकी मदद इस काम में ली जा रही है।

    केंद्रीय बैंक, जिआंगशु प्रांत की राजधानी नानजिंग में डिजिटल प्रयोगशाला भी चला रहा है। चीन की मुद्रा का नाम रेनमिनिबी (आरएमबी) है, पर अतंर्राष्ट्रीय बाजार में यह 'युआन' कही जाती है। डिजिटल युआन का पहला परीक्षण 2020 अक्टूबर में 'टेक हब' कहे जाने वाले शहर शेनझेन लुआउ (जिला) में किया गया, दिसंबर में शियांगचेंग और शेनझेन फुशियन जिले में, 2021 जनवरी में शेनजझेन जांगाउ जिले में, फरवरी में बीज़िग से सटे डांगचेन जिले के सुझ़ाउ शहर में और फरवरी के आखिरी दिनों में चेंगडु प्रांत की सरकार ने दो लाख नागरिकों को शामिल करते हुए अब तक का सबसे बड़ा परीक्षण किया।

    चेंगडु में परीक्षण के अंतर्गत उपहार स्वरूप कुल 4 करोड़ (6.46युआन = 1अमेरिकी डालर) 'डिजिटल युआन' वितरित किए गए। 'चेंगडु काॅमर्शियल डेली' की खबर है कि डिजिटल युआन के प्राप्तकर्ताओं से उपहार राशि को 19 मार्च तक खर्च कर लेने की हिदायत दी गई है। शेनझेन में तो परीक्षण के अंतर्गत 'लाल पैकेट' में मुद्रा उपहार नागरिकों में वितरित किए गए, वहां विशिष्ट अवसरों और त्योहारों पर लाल पैकेट में गिफ्ट देने की परंपरा है। अब तक किए गए छ: परीक्षणों में करीब 5.50 लाख चीनियों को सम्मिलित किया जाना साबित करता है कि 'डिजिटल युआन' (इसे 'ई-सीएनवाई' कहते हैं और 'डिजिटल आरएमबी' भी) को सार्वभौम (साॅवरेन) मुद्रा की हैसियत से लांच करने की छटपटाहट में चीन सांसें ले रहा है। जानकारी मिली है कि अगले वर्ष बीजिंग में होने वाले शीतकालीन ओलंपिक के दौरान भव्य स्तर पर लांचिंग की संभावना है।

    प्रणतेश नारायण बाजपेयी

Saturday, 6 March 2021

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पुस्तकों का प्रकाशक

     प्रोफेसर गोविंद प्रसाद शर्मा ने कहा कि भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पुस्तकों का प्रकाशक है। उन्होंने कहा, यह हमारी प्राथमिकता है कि इन पुस्तकों के माध्यम से हम ऐसी सामग्री का उत्पादन करें जो हमारी समृद्ध संस्कृति और परंपराओं को कहीं आगे ले जाए। श्री शर्मा ने कहा कि इस वर्ष के नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले की विषय-वस्तु विभिन्न आयु समूहों के लिए प्रकाशन के माध्यम से राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कार्यान्वयन की गतिशीलता पर चर्चा करना है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला - 2021 के वर्चुअल संस्करण का उद्घाटन किया। इस अवसर पर शिक्षा मंत्री ने सराहना करते हुए कहा कि 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020' नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले 2021 की थीम है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बारे में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि, यह दुनिया का सबसे बड़ा सुधार बनकर उभरा है, जो भारत को केवल नॉलेज हब के रूप में विकसित करेगा, बल्कि शिक्षार्थियों को आदर्श और वैश्विक नागरिक बनाने में भी मदद करेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उद्धरणजो पढ़ता है, वह राष्ट्र का नेतृत्व करता है' शिक्षा मंत्री ने कहा कि जो पढ़ने, लिखने और सोचने की क्षमता रखता है, वह किसी भी क्षेत्र में नेतृत्व कर सकता है।

शिक्षा मंत्री ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के कार्यान्वयन नीति के तहत एनबीटी द्वारा प्रकाशित 17 द्विभाषी शीर्षक भी लॉन्च किए। ये शीर्षक एनईपी-2020 के दिशानिर्देशों के अनुसार बच्चों के लिए द्विभाषी संस्करण श्रृंखला के तहत द्विभाषी प्रारूप में प्रकाशित किए गए हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों के लिए पूरक पठन सामग्री का निर्माण करना है ताकि वे देश के बहुभाषी माहौल के अनुकूल बन सकें।

राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के निदेशक युवराज मलिक ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति -2020 के रूप में नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला-2021 की विषय-वस्तु नई शिक्षा नीति की दृष्टि से पुस्तक पढ़ने की संस्कृति को आत्मसात करने को समर्पित है। उन्होंने कहा कि, नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला -2021 के माध्यम से एनबीटी नई शिक्षा नीति पर चर्चा करने के लिए 20 से अधिक वेबिनार, सेमिनार और सम्मेलन आयोजित करेगा। श्री मलिक ने यह भी कहा कि राष्ट्र के ज्ञान भागीदार के रूप में, ज्ञान सृजन के साथ-साथ ज्ञान के प्रसार के लिए भी कदम उठाना एनबीटी की जिम्मेदारी है।

दुनिया का सबसे बड़ा जेवर एयरपोर्ट

दुनिया का सबसे बड़ा जेवर एयरपोर्ट    जेवर (गौतम बुद्ध नगर)। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज यहाँ कहाकि बेटी तो बेटी ही होती...