Wednesday, 30 August 2017

महिलाओं को कृषि की मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के लिए रोडमैप

        केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने कहा है कि अपने संपूर्ण जनादेश, लक्ष्यों और उद्देश्यों के अंतर्गत, कृषि मंत्रालय, यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा है कि महिलायें कृषि की मुख्यधारा का हिस्सा बन कर और कृषि पर खर्च होने वाले हर रूपए का फायदा पाकर कृषि उत्पादकता एवं उत्पादन बढ़ाने तथा अपने परिवार की आमदनी को दोगुना करने के लिए प्रभावी ढंग से योगदान दे सकें। 

     सिंह यह बात कांस्टीट्यूशन क्लब में राष्ट्रीय महिला आयोग द्वारा आयोजित महिला किसानों के अधिकारों की सुरक्षा- कार्रवाई के लिए एक रोडमैप की तैयारी विषय पर आयोजित कार्यक्रम में कही। राष्ट्रीय महिला आयोग ने यह कार्यक्रम यूएन महिला और महिला अधिकार किसान मंच के साथ मिलकर आयोजित किया था। सिंह ने कहा कि कृषि में महिलाओं की भागीदारी चिर-परिचित है। 
     एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले तीन दशकों में कृषि क्षेत्र में महिलाओं एवं पुरूषों दोनों की संख्या में गिरावट आई है। जहाँ पुरुषों में संख्या 81 प्रतिशत से घटकर 63 प्रतिशत हो गई है, वहीं महिलाओं की संख्या 88 प्रतिशत से घटकर 79 प्रतिशत ही हुई है, क्योंकि महिलाओं की जानसंख्‍या में गिरावट पुरूषों की जनसंख्‍या में गिरावट से काफी कम है, इसलिए इस प्रवृति को आसानी से भारतीय कृषि का महिलाकरण कहा जा सकता है।
       केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि भारत सहित अधिकतर विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था में ग्रामीण महिलाओं का सबसे अधिक योगदान है। आर्थिक रुप से सक्रिय 80 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं। इनमें से 33 प्रतिशत मजदूरों के रुप में और 48 प्रतिशत स्व-नियोजित किसानों के रुप में कार्य कर रही हैं। एनएसएसओ (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय) रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लगभग 18 प्रतिशत खेतिहर परिवारों का नेतृत्व महिलाएं ही करती हैं। कृषि का कोई कार्य ऐसा नहीं है जिसमें महिलाओं की भागीदारी न हो। 
     केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि बतौर श्रमिक उन्हें पुरूषों की अपेक्षा मिलने वाली कम दरों तथा पुरूषों की अपेक्षा अधिक समय तक काम करने जैसी कई असमानताओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही अपने अधिकारों, अवसरों और सुविधाओं की अनभिज्ञता उनकी कृषि में भागीदारी को और जटिल कर देती है। महिलाएं कृषि में बहुआयामी भूमिकाएं निभाती हैं जहाँ बुवाई से लेकर रोपण, निकाई, सिंचाई, उर्वरक डालना, पौध संरक्षण, कटाई, निराई, भंडारण आदि सभी प्रक्रियाओं से वो जुडी हुई हैं, वहीँ घर गृहस्थी के काम जैसे कि खाना पकाना, जल संग्रहण, ईंधन लकड़ी का संग्रहण, घरेलू रख-रखाव आदि के कार्य भी उन्ही के क्षेत्र में आते हैं। 
     सिंह ने कहा कि इसके अलावा महिलाएं कृषि से सम्बंधित अन्य धंधो जैसे, मवेशी प्रबंधन, चारे का संग्रह, दुग्ध और कृषि से जुडी सहायक गतिविधियों जैसे मधुमक्खी पालन, मशरुम उत्पादन, सूकर पालन, बकरी पालन, मुर्गी पालन इत्यादि में भी पूरी तरह सक्रिय रहती हैं।
        महिलाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए मंत्रालय की वर्तमान गतिविधियां। विभिन्न प्रमुख योजनाओं/कार्यक्रमों और विकास संबंधी गतिविधियों के अंतर्गत महिलाओं के लिए कम से कम 30ऽ धनराशि का आबंटन, विभिन्न लाभार्थी-उन्मुखी कार्यक्रमों/योजनाओं और मिशनों के घटकों का लाभ महिलाओं तक पहुचाने के लिए महिला समर्थित गतिविधियां शुरु करना; तथा महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के गठन पर ध्यान केंद्रित करना ताकि क्षमता निर्माण जैसी गतिविधियों के माध्यम से उन्हें माइक्रो क्रेडिट से जोडा जा सके और सूचनाओं तक उनकी पहुंच बढ़ सके एवं साथ ही विभिन्न स्तरों पर निर्णय लेने निकायों में उनका प्रतिनिधित्व हो।
     केन्‍द्रीय कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्रालय ने पिछले वर्ष से प्रतिवर्ष 15 अक्‍टूबर को महिला किसान दिवस मनाने का फैसला किया है। यह महिला सशक्‍तिकरण की दिशा में बढ़ते कदम का प्रतीक है।

Tuesday, 29 August 2017

भारत में मिठास क्रांति के सौ वर्ष

        केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधा मोहन सिंह ने पूसा नई दिल्ली में गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र करनाल द्वारा आयोजित भारत में मिठास क्रांति के सौ वर्ष: प्रजाति 205 से प्रजाति 0238  तक (गन्ने की विभिन्न प्रजातियां) और न्यू इंडिया मंथन संकल्प से सिद्धि कार्यक्रम में लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा कि वानस्पतिक (बोटनिस्ट) सर डा. वेंकटरमण के सहयोग से देश की पहली अन्तरजातीय संकर प्रजाति (सेकेरम ऑफसिनेरम व सेकेरम स्पोंटेनियम का क्रॉस) प्रजाति 205 उपोष्ण जलवायु हेतु विकसित की, जिसे वाणिज्यिक खेती के लिए 1918 में जारी किया गया। 

    इस हाइब्रिड के कारण उत्तर भारत में गन्ना उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई व इसने प्रचलित सेकेरम बारबरी और सेकेरम साईंनैन्सिस जैसी गन्ने की प्रजातियों को मात दी। राधा मोहन सिंह ने जानकारी दी कि प्रजाति 205 के बाद गन्ना प्रजनन संस्थान ने उपोषण जलवायु के लिये कई महत्वपूर्ण गन्ना किस्मो को विकसित की, जिनका वर्चस्व काफी समय तक रहा। इसके बाद गन्ना प्रजनन संस्थान ने उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु के लिये पहली अदभुत गन्ना किस्म प्रजाति 312 वर्ष 1928 में विकसित की तथा उष्ण कटिबंधीय जलवायु के लिये पहली अदभुत गन्ना किस्म प्रजाति 419 वर्ष 1933 में विकसित की। 
     सिंह ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से उनकी सरकार के आने के बाद गन्ना प्रजनन संस्थान क्षेत्रीय केन्द्र, करनाल में विकसित प्रजाति 0238 के पूरे उत्तर भारत में विस्तार के बाद, इस क्षेत्र के हर राज्य में गन्ने की पैदावार तथा चीनी रिकवरी में सार्थक वृद्धि देखने को मिली है। पिछले सीजन में प्रजाति 0238 की उत्तर प्रदेश में 36 प्रतिशत, पजांब में 63 प्रतिशत, हरियाणा में 39 प्रतिशत, उत्तराखण्ड में 17 प्रतिशत व बिहार में 16 प्रतिशत गन्ना क्षेत्रफल में खेती की गई। प्रजाति 0238 तथा प्रजाति 0118 पूरे उत्तर भारत की चीनी मिलों की पहली पंसद बन चुकी है। प्रजाति 0238 से गन्ना किसान अधिक पैदावार प्राप्त कर रहै हैं व चीनी मिलें अधिक चीनी प्राप्त कर रहीं हैं। 
      केन्द्रीय कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि गन्ना किसान अंतर फसलन में गन्ने के साथ तिलहन, दलहन, आलू आदि कि भी नई तकनीक अपना कर अपनी आय बढ़ाये। साथ ही राधा मोहन सिंह ने कहा कि भारत में मिठास क्रांति के सौ वर्ष के कार्यक्रम के साथ वह यह कहने भी आए हैं कि देश भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है। 
      अग्रेजों की बर्बरता के विरूद्ध नौजवानों ने त्याग, तपस्या, बलिदान, संघर्ष एवं हिम्मत को अपनी प्रेरणा बनाकर अंग्रेजों भारत छोड़ो का संकल्प 9 अगस्त 1942 को लिया था और 1947 में वह महान संकल्प सिद्ध हुआ तथा देश स्वतंत्र हुआ। सिंह ने कहा कि उसके बाद 1942 से 15 अगस्त 1947 तक के पांच वर्ष, देश की आजादी के महा अभियान संकल्प से सिद्धि के रूप में सदैव स्मरण किए जाते हैं। 
    अंत मे केन्द्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि आज हम सभी भी यह संकल्प ले कि 15 अगस्त 2022 जब हम आजादी के 75 वी वर्षगांठ मनाएंगे तो उस समय तक आज से 5 वर्षो तक अपने परिश्रम को ईमानदारी की प्राकाष्ठा तक पहुंचा कर नये भारत का निर्माण करेंगे। किसानों की आय दुगनी करेंगे।

Wednesday, 23 August 2017

प्रधानमंत्री किसान सम्‍पदा योजना को मंजूरी, 6,000 करोड़ रुपये का आवंटन

      प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल ने बैठक में 14वें वित्‍त आयोग के चक्र की सह-समाप्ति वर्ष 2016-20 अ‍वधि के लिए 6,000 करोड़ रुपये के आवंटन से केन्‍द्रीय क्षेत्र की नई स्‍कीम-सम्‍पदा कृषि समुद्री उत्‍पाद प्रसंसकरण एवं कृषि प्रसंस्‍करण क्‍लस्‍टर विकास योजना के पुन: नामकरण प्रधानमंत्री किसान सम्‍पदा योजना का अनुमोदन कर दिया है।

     प्रधानमंत्री किसान सम्‍पदा योजना का उद्देश्‍य कृषि न्‍यूनता पूर्ण करना, प्रसंस्‍करण का आधुनिकीकरण करना और कृषि-बर्बादी को कम करना है। 6,000 करोड़ रुपए के आवंटन से प्रधानमंत्री किसान सम्‍पदा योजना से 2019-20 तक देश में 31,400 करोड़ रुपए के निवेश के लैवरेज होने, 1,04,125 करोड़ रुपये मूल्‍य के 334 लाख मीट्रिक टन कृषि उत्‍पाद के संचलन, 20 लाख किसानों को लाभ प्राप्‍त होने और 5,30,500 प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रोजगार सृजित होने की आशा है। 
     पीएमकेएसवाई के कार्यान्‍वयन से आधुनिक आधारभूत संरचना का निर्माण और प्रभावी आपूर्ति श्रृंखला तथा फार्म के गेट से खुदरा दुकान तक प्रभावी प्रबंधन हो सकेगा। इससे देश में खाद्य प्रसंस्‍करण को व्‍यापक बढ़ावा मिलेगा। इससे किसानों को बेहतर मूल्‍य पाने में मदद मिलेगी और यह किसानों की आमदनी दोगुना करने के दिशा में एक बड़ा कदम है। इससे रोजगार के बड़े अवसर विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्‍ध हो सकेंगे। इससे कृषि उत्‍पादों की बर्बादी रोकने, प्रसंस्‍करण स्‍तर बढ़ाने, उपभोक्‍तओं को उचित मूल्‍य पर सुरक्षित और सुविधाजनक प्रसंस्‍कृत खाद्यान्‍न की उपलब्‍धता के साथ प्रसंस्‍कृत खाद्यान्‍न का निर्यात बढ़ाने में मदद मिलेगी। 
        खाद्य प्रसंस्‍करण और सकल घरेलू उत्‍पाद, रोजगार और निवेश में इसके योगदान के अनुरूप भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के एक महत्‍वपूवर्ण खंड के रूप में उभरा है। 2015-16 के दौरान इस क्षेत्र का विनिर्माण एवं कृषि क्षेत्रों में जीवीए का क्रमश: 9.1 और 8.6ऽ हिस्‍सा था। एनडीए सरकार के घोषणा पत्र का बल किसानों के लिए बेहतर आय उपलब्‍ध कराने तथा जॉब्‍स सृजन के लिए खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग की स्‍थापना करने को प्रोत्‍साहित देने पर है। 
       सरकार ने खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र को प्रोत्‍साहन देने के लिए अन्‍य अनेक कदम उठाए हैं, जैसे खाद्य प्रसंस्‍करण और खुदरा क्षेत्र में निवेश को गति देने के लिए सरकार ने भारत में निर्मित और अथवा उत्‍पादित खाद्य उत्‍पादों के बारे में ई-कॉमर्स के माध्‍यम से व्‍यापार सहित व्‍यापार में 100 प्रतिशत प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी है। इससे किसानों को बहुत अधिक लाभ होगा तथा बैक एंड अवसंरचना का सृजन होगा और रोजगार के महत्‍वपूर्ण अवसर प्राप्‍त होंगे।
         सरकार ने अभिहित खाद्य पार्कों और इनमें स्थित कृषि-प्रसंस्‍करण यूनिटों को रियायती ब्‍याज दर पर वहनीय क्रेडिट उपलब्‍ध कराने के लिए नाबार्ड में 2000 करोड़ रूपए का विशेष कोष भी स्‍थापित किया है। खाद्य एवं कृषि आधारित प्रसंस्‍करण यूनिटों तथा शीतश्रृंखला अवसंरचना को प्राथमिकता क्षेत्र उधारी (पीएसएल) की परिधि में लाया गया है ताकि खाद्य प्रसंस्‍करण कार्यकलापों और अवसंरचना के लिए अतिरिक्‍त क्रेडिट उपलब्‍ध कराया जा सके और इस प्रकार खाद्य प्रसंस्‍करण को प्रोत्‍साहन मिलेगा, बर्बादी में कमी आएगी, रोजगार सृजित होगा एवं किसानों की आय बढ़ेगी।
          प्रधानमंत्री किसान सम्‍पदा योजना के कार्यान्‍वयन से खेत से लेकर खुदरा दुकानों तक कार्यक्षम आपूर्ति प्रबंधन सहित आधुनिक अवसंरचना का सृजन होगा। यह देश में न केवल खाद्य प्रसंस्‍करण क्षेत्र के लिए न केवल बड़ा प्रोत्‍साहन होगा बल्कि किसानों को बेहतर मूल्‍य प्राप्‍त करने मे सहायक होगा और किसानों की आय को दुगुना करने की एक बड़ा कदम है।

Monday, 21 August 2017

फसल बीमा के लिए अब ड्रोन प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल

       प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने कृषि क्षेत्र से जुड़ी दो प्रमुख परियोजनाओं, मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्ड और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना में प्रगति की समीक्षा की। 

   प्रधानमंत्री को यह जानकारी दी गई कि 16 राज्‍यों केन्‍द्र शासित प्रदेशों में मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्डों के वितरण का पहला चक्र पूरा हो गया है। शेष राज्‍यों में कुछ सप्‍ताहों में पूरा हो जाने की संभावना है। प्रगति की समीक्षा करते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि सेम्‍पलिंग ग्रिड में और विभिन्‍न मृदा जांच प्रयोगशालाओं में होने वाले अंतर के लिए समुचित जांच की जानी चाहिये। 
     उन्‍होंने कहा कि इससे रिपोर्ट की गुणवत्‍ता सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री ने जोर देते हुए यह भी कहा कि मृदा स्‍वास्‍थ्‍य कार्डों की छपाई क्षेत्रीय भाषा में की जानी चाहिए ताकि किसान उन्‍हें आसानी से पढ़ने और समझने में सक्षम हो। अत्‍याधुनिक प्रौद्योगिकी को शीघ्र अपनाये जाने पर बल देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि संयोगवश मिट्टी की जांच तो बहुत ही हल्‍के उपकरणों द्वारा संभव है, जिन्‍हें हाथों में लेकर भी चला जा सकता है।
           उन्‍होंने अधिकारियों से यह मांग करते हुए कहा कि वे इस बात की संभावना तलाशें ताकि इस कार्य में स्‍टार्टअप और उद्यमिता को शामिल किया जा सके। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के बारे में, प्रधानमंत्री को यह बताया गया कि वर्ष 2016 के खरीफ मौसम में और 2016-17 के रबी मौसम में 7700 करोड़ रुपए से अधिक मूल्‍य के दावे का भुगतान किया गया है।
          इससे 90 लाख से अधिक किसान लाभान्‍वित हुए हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा कि फसल बीमा के दावे से संबंधित आंकड़े जल्‍द-से-जल्‍द संग्रह करने के काम में स्‍मार्ट फोन, दूरसंवेदी उपकरणों, उपग्रह आंकड़े और ड्रोन सहित अत्‍याधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। समीक्षा बैठक के दौरान कृषि मंत्रालय, नीति आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय के वरिष्‍ठ अधिकारी उपस्‍थित थे।

Wednesday, 16 August 2017

दीर्घकालीन सिंचाई निधि के लिए 9020 करोड़

    प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने वर्ष 2017-18 के दौरान आवश्‍यकतानुसार 9020 करोड़ रूपये तक के अतिरिक्‍त बजटीय संसाधन जुटाने की मंजूरी दी है। 

      यह राशि नाबार्ड द्वारा प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) के तहत चल रही प्राथमिकता वाली 99 सिंचाई परियोजनाओं और इसके साथ-साथ उनके कमांड क्षेत्र विकास (सीएडी) के त्‍वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम (एआईबीपी) कार्यों के कार्यान्वयन के लिए ऋण के संदर्भ में 6 प्रतिशत प्रतिवर्ष की ब्‍याज दर सुनिश्चित करने के लिए बॉन्‍ड जारी करके जुटाई जायेगी। 
    त्‍वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रमों (एआईबीपी) के तहत अनेक प्रमुख और मध्‍यम सिंचाई परियोजनाएं मुख्‍य रूप से निधियों के अपर्याप्‍त प्रावधान के कारण अधूरी पड़ी थी। वर्ष 2016-17 के दौरान पीएमकेएसवाई (एआईबीपी और सीएडी) के अधीन चल रही 99 परियोजनाओं की दिसम्‍बर 2019 तक कई चरणों में पूरी करने के लिए पहचान की गई थी।
       बड़ी मात्रा में निधि की आवश्‍यकता को पूरा करने और इन परियोजनाओं का कार्य पूरा करने के लिए केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री ने अपने बजट भाषण 2016-17 के दौरान पीएमकेएसवाई-एआईबीपी और सीएडी के तहत पहचान की गई, मौजूदा परियोजनाओं के लिए केन्‍द्र और राज्‍यों के हिस्‍से के वित्‍तपोषण के लिए 20 हजार करोड़ रूपये की आरंभिक निधि के साथ नाबार्ड में समर्पित दीर्घकालीन सिंचाई निधि (एलटीआईएफ) के सृजन की घोषणा की थी। 
     राज्‍यों के लिए नाबार्ड से ऋण को आकर्षक बनाने के लिए वर्ष 2016-17 से 2019-20 के दौरान नाबार्ड को प्रतिवर्ष अपेक्षित लागत मुक्‍त निधियां उपलब्‍ध कराकर ब्‍याज की दर 6 प्रतिशत के आस-पास बनाये रखने का निर्णय लिया गया था। वर्ष 2016-17 के दौरान नाबार्ड ने एलटीआईएफ के तहत कुल 9086.02 करोड़ रूपये की राशि वितरित की, इसमें से 2414.16 करोड़ रूपये पोलावरम परियोजना (ईबीआर घटक के बिना) के लिए जारी किये गये और बाकी 6671.86 करोड़ रूपये पहचान की गई ईबीआर उपयोग वाली परियोजनाओं के लिए जारी किये गये थे।
     इसके अलावा 924.9 करोड़ रूपये बजटीय प्रावधान के माध्‍यम से केन्‍द्रीय सहायता (सीए) के रूप में वितरित किये गये। वर्ष 2016-17 के दौरान नाबार्ड ने ईबीआर के रूप में भारत सरकार की पूर्ण अदायगी वाले बॉन्‍ड के रूप में 2187 करोड़ रूपये की कुल राशि जुटाई थी। वर्ष 2017-18 के दौरान एलटीआईएफ के माध्‍यम से 29 हजार करोड़ रूपये की अनुमानित राशि की जरूरत होगी, जिसके लिए 9020 करोड़ रूपये की ईबीआर अपेक्षित होगी। 
       राज्‍यों और केन्‍द्रीय जल आयोग द्वारा विभिन्‍न समीक्षा बैठकों के दौरान बतायी गयी स्थिति के अनुसार 18 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं या लगभग पूरी होने वाली हैं। इन सभी 99 परियोजनाओं से 2016-17 के दौरान 14 लाख हेक्‍टेयर से अधिक सिंचाई संभावना उपयोग की उम्‍मीद है। 
      वर्ष 2017-18 के दौरान 33 से अधिक परियोजनाएं पूरी होने की संभावना है। पहचान की गई सिंचाई परियोजनाओं के पूरा होने और निर्माण चरण के दौरान बड़ी तादाद में वेतन वाले और अन्‍य रोजगार अवसरों का सृजन होगा। 
     यह भी महत्‍वपूर्ण है कि परियोजनाओं के पूरा होने पर लगभग 76 लाख हेक्‍टेयर सिंचाई संभावना का उपयोग इस क्षेत्र में कृषि परिदृश्‍य को पूरी तरह बदल देगा जिसके परिणाम स्‍वरूप फसलों की सघनता, फसल प्रणाली में परिर्वतन, कृषि प्रसंस्‍करण और अन्‍य सहायक गतिविधियों के माध्‍यम से बड़ी संख्‍या में रोजगार के अवसरों का सृजन होगा।

Wednesday, 9 August 2017

2023-24 तक 300 मिलियन टन दूध उत्‍पादन का लक्ष्‍य

       भारत दूध उत्‍पादन में पहले स्‍थान पर है। 2015-16 के दौरान यहां 155.48 मिलियन टन वार्षिक दूध का उत्‍पदन हुआ, जो विश्‍व के उत्‍पादन का 19 प्रतिशत है। पशुपालन, डेयरी और मत्स्यपालन विभाग, कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय ने 2023-24 तक 300 मिलियन टन दूध उत्‍पादन का राष्‍ट्रीय लक्ष्‍य रखा गया है। 

     उसके साथ-साथ इसी अवधि के दौरान 40.77 मिलियन प्रजनन योग्‍य नॉन-डिस्क्रिप्‍ट गायों की उत्‍पादकता को 2.15 किग्रा प्रतिदिन से बढ़ाकर 5.00 किग्रा प्रतिदिन करने का भी लक्ष्‍य रखा गया है। 19वीं पशुधन संगणना, 2012 के अनुसार भारत में 300 मिलियन बोवाईन आबादी है। 190 मिलियन गोपशु आबादी में से 20 प्रतिशत विदेशी तथा वर्ण संकरित (39 मिलियन) हैं तथा लगभग 80 प्रतिशत देसी तथा नॉन-डिस्क्रिप्‍ट नस्‍लों के हैं। 
      हालांकि भारत में विश्‍व आबादी के 18 प्रतिशत से भी अधिक गाय हैं, परंतु गरीब किसान की सामान्‍य भारतीय गाय प्रतिदिन मुश्किल से 1 से 2 लीटर दूध देती है। 80 प्रतिशत गाय के केवल 20 प्रतिशत दूध का योगदान देती हैं। यद्यपि भारत ने दूध उत्‍पादन में अपने उच्‍च स्‍तर को बनाए रखा है परंतु दूसरी ओर देसी तथा नॉन-डिस्क्रिप्‍ट नस्‍ल के लगभग 80 प्रतिशत गोपशु कम उत्‍पादकता वाले हैं, जिनकी उत्‍पादकता में उपयुक्‍त प्रजनन तकनीकों को अपनाकर सुधार किए जाने की आवश्‍यकता है। 
        उत्‍पादकता में वृद्धि करने की महत्‍वपूर्ण कार्यनीति कृत्रिम गर्भाधान (एआई) सुनिश्चित करना है। कृत्रिम गर्भाधान देश में बोवाईनों की आनुवंशिक क्षमता का उन्‍नयन करते हुए उनके दूध उत्‍पादन और उत्‍पादकता को बढ़ाकर बोवाइन आबादी की उत्‍पादकता में सुधार करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इस मूल गतिविधि को राष्‍ट्रीय गौकुल मिशन की एकछत्र योजना के अंतर्गत चल रही अग्रणी योजनाओं, राष्‍ट्रीय बोवाईन प्रजनन (एनपीबीबी) तथा देसी नस्‍लों संबंधी कार्यक्रम (आईबी) के माध्‍यम से संपुष्‍ट किया जाता है। इन योजनाओं में दोहरे लाभ की परिकल्‍पना की गई है, जैसे उत्‍पादकता में सुधार करना, दूध उत्‍पादन को बढ़ाना, किसानों की आय को बढ़ाना जिससे 2020 तक उनकी आय को दोगुना करने के सरकार के महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य को प्राप्‍त करने में सहायता मिलेगी।
         यद्यपि इन योजनाओं के अंतर्गत किसानों के घर द्वार पर प्रजनन आदानों की सुपुर्दगी के लिए प्रजनन अवसंरचना को काफी सुदृढ़ किया गया है, तब भी कृत्रिम गर्भाधान कवरेज अभी तक प्रजनन योग्‍य आबादी का 26 प्रतिशत ही है। राज्‍यों द्वारा उपलब्‍ध कराए गए 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार एक कृत्रिम गर्भाधान कामगार प्रतिदिन की न्‍यूनतम 4 गर्भाधान की अपेक्षित औसत के मुकाबले केवल 1.92 कृत्रिम गर्भाधान करते हैं। इसके अलावा एक सफल गर्भधारण के लिए 3 वीर्य खुराकों का प्रयोग होता है। 
       इस प्रकार प्रत्‍येक सफल कृत्रिम गर्भधारण के लिए 3 वीर्य खुराकों के उपयोग से उच्‍च गुणवत्‍ता वाले वीर्य की बर्बादी होती है। देसी सांड के वीर्य का उपयोग कुल कृत्रिम गर्भाधान कवरेज का केवल 11 प्रतिशत होने से यह स्थिति और खराब हो जाती है। 2020 तक किसानों की आय को दोगुना करने के सरकार के महत्‍वाकांक्षी लक्ष्‍य में सहायता करने के लिए 2017-18 हेतु 100 मिलियन कृत्रिम गर्भाधान के राज्‍य-वार लक्ष्‍य को साझा किया गया है। इस संबंध में पशुपालन, डेयरी और मत्‍स्‍यपालन विभाग द्वारा राज्‍यों को निदेश दिए गए हैं।

Thursday, 3 August 2017

ब्रिक्‍स कृषि अनुसंधान केन्‍द्र की स्‍थापना

        प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी की अध्‍यक्षता में केन्‍द्रीय मंत्रिमंडल ने ब्रिक्‍स कृषि शोध प्‍लेटफॉर्म (ब्रिक्‍स-एआरपी) की स्‍थापना के लिए भारत और ब्रिक्‍स के अन्‍य सदस्‍य देशों के बीच हस्‍ताक्षरित सहमति पत्र (एमओयू) को अपनी पूर्वव्‍यापी मंजूरी दे दी है।

     रूस के ऊफा में 9 जुलाई, 2015 को आयोजित सातवें ब्रिक्‍स शिखर सम्‍मेलन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने ब्रिक्‍स कृषि अनुसंधान केन्‍द्र की स्‍थापना का प्रस्‍ताव रखा जो पूरे विश्‍व को एक उपहार होगा। यह केन्‍द्र ब्रिक्‍स के सदस्‍य देशों में खाद्य सुरक्षा उपलब्‍ध कराने के लिए कृषि क्षेत्र में नीतिगत सहयोग के जरिए सतत कृषि विकास एवं गरीबी उन्‍मूलन को बढ़ावा देगा। 
        ब्रिक्‍स देशों में छोटे किसानों द्वारा की जाने वाली खेती के लिए प्रौद्योगिकियों सहित कृषि अनुसंधान नीति, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, नवाचार एवं क्षमता निर्माण के क्षेत्र में ब्रिक्‍स देशों के बीच सहयोग को और अधिक बढ़ाने के लिए भारत के गोवा में 16 अक्‍टूबर, 2016 को आयोजित आठवें ब्रिक्‍स शिखर सम्‍मेलन में ब्रिक्‍स देशों के मंत्रियों द्वारा कृषि अनुसंधान प्‍लेटफॉर्म की स्‍थापना के लिए एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्‍ताक्षर किये गये थे। 
       विश्‍व में भूखमरी, गरीबी एवं विषमता, विशेष रूप से किसानों और गैर किसानों की आय में विषमता से जुड़े मसलों को सुलझाने और कृषि व्‍यापार, जैव सुरक्षा एवं जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक कृषि आधारित सतत विकास हेतु प्राकृतिक वैश्विक प्‍लेटफॉर्म के रूप में ब्रिक्‍स – कृषि अनुसंधान प्‍लेटफॉर्म (एआरपी) की प्रस्‍तावना की गई है।

Wednesday, 2 August 2017

दक्षिणी एशियाई एवं अफ्रीकी देशों में खाद्य उत्पादन एवं कौशल विकास के लिए एक वरदान

       आईएसएआरसी की स्‍थापना के लिए कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्‍याण विभाग के प्रतिनिधि के रूप में सचिव डीएसीएंडएफडब्‍ल्‍यू और अन्‍तरराष्‍ट्रीय चावल अनुसंधान संस्‍थान (आईआरआरआई), फिलिपींस के महानिदेशक आईआरआरआई द्वारा करार ज्ञापन (एमओए) पर हस्‍ताक्षर किये गये।

    केन्द्रीय कृषि एवं किसान कल्‍याण मंत्री, राधा मोहन सिंह भी इस मौके पर मौजूद थे। इस अवसर पर राधा मोहन सिंह ने कहा कि यह केन्‍द्र पूर्वी भारत में प्रथम अंतर्राष्‍ट्रीय केन्‍द्र बनेगा तथा यह क्षेत्र में चावल उत्‍पादन को उपयोग में लाये जाने तथा उसको बनाये रखने में मुख्‍य भूमिका अदा करेगा। इसको पूर्वी भारत और समान पारिस्‍थितिकी वाले अन्‍य दक्षिणी एशियाई एवं अफ्रीकी देशों में खाद्य उत्‍पादन एवं कौशल विकास के लिए एक वरदान साबित होने की संभावना है। 
        केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि यह चावल मूल्‍य वर्धन (सीईआरवीए) में एक उत्‍कृष्‍टता केन्‍द्र होगा और इसमें खाद्यान्‍न और भूसे में निहित भारी धातु की गुणवत्‍ता एवं स्‍थिति सुनिश्‍चित करने की क्षमता वाली एक आधुनिक तथा उन्‍नत प्रयोगशाला शामिल होगी। यह केन्‍द्र चावल मूल्‍य श्रृंखला से जुड़े हितधारकों के लिए क्षमता निर्माण का कार्य भी करेगा। आईआरआरआई न्‍यासी बोर्ड के शासन के तहत आईएसएआरसी का प्रचालन किया जाएगा और आईआरआरआई आईएसएआरसी के निदेशक के रुप में एक उपयुक्‍त आईआरआरआई स्‍टाफ सदस्‍य को नियुक्‍त करेगा।
         समन्‍वय समिति का गठन किया जाएगा जिसमें अध्‍यक्ष के रुप में महानिदेशक, आईआरआरआई एवं सह-अध्‍यक्ष के रुप में सचिव, भारत सरकार, कृषि, सहकारिता एवं किसान कल्‍याण विभाग होंगे। समन्‍वय समिति के अन्‍य सदस्‍य-उप-महानिदेशक (फसल विज्ञान), आईसीएआर; निदेशक, एनएसआरटीसी; भारत में आईआरआरआई प्रतिनिधि, उत्‍तर प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि एवं नेपाल एवं बांग्‍लादेश सरकार के प्रतिनिधि एवं निजी क्षेत्र हैं। 
       सिंह ने कहा है कि चावलों की विशेष किस्‍मों को विकसित करने के लिए भारत की समृद्ध जैव विविधता को उपयोग में लाया जाएगा। इससे भारत को प्रति हैक्‍टेयर अधिक उपज और समुन्‍नत पोषाहारीय अंश प्राप्‍त करने में मदद मिलेगी। इसके द्वारा भारत की खाद्यान्‍न और पोषाहारीय संबंधी समस्‍या का भी निदान होगा। यह केन्‍द्र देश में मूल्‍य श्रृंखला आधारित उत्‍पादन प्रणाली को अपनाने में भी सहायता देगा।
          यह केन्‍द्र बर्बादी को कम करने के साथ-साथ मूल्‍य में वृद्धि करके किसानों के लिए उच्‍च आमदनी का मार्ग भी प्रशस्‍त करेगा। दक्षिण एशियाई और अफ्रीकी देशों के अलावा पूर्वी भारत के किसान इस केन्‍द्र से विशेष रुप से लाभान्‍वित होंगे।

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